जस्टिस काटजू से एडिटर्स नाराज़ हैं (सभी पत्रकार नहीं)। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्वयंभू झंडाबरदार बीएई एकदम हल्लाबोल की मुद्रा में है . . . पर क्यों- आखिर - भय बिन होत प्रीत न - पर ऐतराज़ क्या है. . . इसी सिद्धांत पर तो सारे न्यूज़ चैनल (कम से कम हिंदी के) चल रहे हैं . . . हर एडिटर सर्वेसर्वा है- जब चाहे जिसे चाहे ज़लील करे और विरोध पर निकाल फेंके.... संदेश साफ़ है नौकरी करनी है तो डर के करो वरना बाहर....
आप चाहें तो इस सच से इनकार भी कह सकते हैं... बहरहाल साधना न्यूज़ में नौकरी के दौरान मैं अपने साथियों (सामान्यतः आउटपुट, इनपुट इंचार्ज, पीसीआर हेड) से कहता था कि चाहे तो आप अधिकारी होने का भ्रम पाल सकते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इन चैनलों में सिर्फ़ एक ही अधिकारी होता है और बाकी सब चपरासी..... वो पीडी हों या एनके हों- जब चाहे किसी की भी पैंट न्यूज़रूम में उतार सकते थे/हैं, उतारते रहे हैं..... अब कुछ लोग ये स्वीकार करने लगे हैं, कुछ अब भी भ्रम में जीते हैं कि- नहीं जी आज तक हमको ऐसा नहीं कहा- एकबारगी मान भी लें, तो कोई गारंटी नहीं कि आगे भी नहीं कहा जाएगा......
टीवी न्यूज़ में साढ़े आठ साल काम करने के दौरान मैंने एक बात साफ़ समझ ली- कि ये चैनल ईगो पर चल रहे हैं, सिर्फ ईगो पर . . . न कोई सिस्टम- न सिद्धांत, बस एडिटर का ईगो . . . इन चैनलों में काम करने वाले लोग, ख़ासतौर पर एडिटोरियल के- हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं...... बाकी विभागों के साथ कोई दिक्कत नहीं- वो नौकरी कर रहे हैं, प्रेस के आईकार्ड से क्षमतानुसार फ़ायदे उठा रहे हैं.... लेकिन एडिटोरियल पर पत्रकारिता का दबाव भी है.... पत्रकार का लेबल लगने भर से ही इंटर्न भी दबाव में आ जाता है.... उसे समाज में (गैर पत्रकारीय) सम्मान से देखा जाने लगता है और बहुत जल्द ही वो खुद को दूसरों से थोड़ा 'ऊपर' महसूस करने लगता है.... लेकिन न्यूज़रूम में आते है उसे बता दिया जाता है कि वो कितना नीचे है....
तो अक्सर जब तक आदमी को समझ आता है कि अब यहां पत्रकारिता या ग्लैमर (जो जिस वजह से आया हो) नहीं है तब तक अक्सर वो इतना वक्त इसमें लगा चुका होता है कि बाहर निकलना संभव नहीं हो पाता.... फिर वो बस सिस्टम का एक पुर्जा बनकर रह जाता है...
और ये सिस्टम बहुत ज़ालिम और दोगला है.... दो दिन पहले जस्टिस काटजू के साथ बैठक का विरोध करने वालों में दैनिक जागरण के संजय गुप्ता और पंजाब केसरी के अश्विनी कुमार भी थे.... जागरण तो नहीं लेकिन मैंने पंजाब केसरी में काम किया है.... पहली नौकरी पंजाब केसरी, जालंधर में ही मिली थी.... मैं कह सकता हूं कि हिंदी में पेड न्यूज़ का खुला खेल शुरू इसी अख़बार में शुरू किया होगा.... पत्रकारों के शोषण के कीर्तिमान भी इसी ने रचे होंगे.....
लेकिन मुझे इन बनियों से ज़्यादा शिकायत भी नहीं है.... वो धंधा करने उतरे हैं... कोयले से ज़्यादा फ़ायदा ख़बरों में दिखा तो इसी में लग गए- दूसरी पीढ़ी ने संपादक का चोला ओढ़ा तो संपादकों वाली बोली भी बोलने लगे- और ये कोई मुश्किल काम नहीं.... संपादक कौन सा वही बोलता है जो करता है.... वो भी तो वही करता है जो ये मालिक-संपादक करते हैं.... मालिक संपादक नहीं तो संपादक वही करता है जो मालिक चाहता है.....
मजीठिया आयोग की सिफा़रिशें आईं तो अख़बार मालिक बेचैन हो गए... बिसूरने लगे कि हम तो लुट जाएंगे... हालांकि हर साल नए मॉडल की गाड़ी उनके घर आती है.... लेकिन कोई संपादक झंडा लेकर ऐसे खड़ा नहीं हुआ जैसे जस्टिस काटजू के खिलाफ़ खड़े हो गए हैं.....
दरअसल संपादकों, मालिकों की दिक्कत ये है कि वो भय बिन प्रीत न होत को सही तो मानते हैं और उस पर अमल भी करते हैं लेकिन सिर्फ़ वहीं तक जहां तक उनका भय कायम रहे....जब कोई और उन्हें नियमों में रहने, जवाबदेह होने का डंडा दिखाता है तो ये फाउल-फाउल चिल्लाने लगे हैं.....
बीईए में शामिल एक स्वनामधन्य एडिटर से बड़े न्यूज़ चैनल का एक छोटा सा उदाहरण..... एक स्वनामधन्य एंकर कम वैरी सीनियर प्रोड्यूसर ने प्रोग्रामिंग हेड से एक लड़के की शिकायत की कि वो उन्हें नमस्ते नहीं करता जबकि वो उन्हीं के प्रोग्राम की टीम में है..... सिर्फ़ शिकायत ही नहीं की मोहतरमा उस घमंडी लड़के को निकालने पर अड़ गईं..... प्रोग्रामिंग हेड ने उस लड़के से पूछा कि क्या यह सच है- उसने कहा कि जी आप हमारे इंचार्ज हैं, मैं आपको नमस्ते करता हूं..... बस प्रोग्रामिंग हेड ने उसे कह दिया कि कल से आने की ज़रूरत नहीं है..... न उन्होंने मैडम एंकर से ये पूछा कि काम में तो कोई दिक्कत नहीं, अनुशासनहीन तो नहीं..... न ही लड़के की किसी और बात को सुना- मैडम को नमस्ते नहीं करते- तो मत आना....
बीईए में शामिल एक और स्वनामधन्य एडिटर महोदय जो आजकल शायद सिर्फ़ काटजू विरोध पर जी रहे हैं के बारे में भी सुनिए..... पत्रकारिता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले महोदय का सबसे प्रिय शगल है अपने जूनियर्स को ज़लील करना..... एडिटोरियल मीटिंग्स से पहले सबसे ज़्यादा अटकल इसी बात पर रहती है कि आज किसकी लगेगी..... आदिवासियों के देवताओं सरीखे टीआरपी सिस्टम की श्रीमान आलोचना भी करते हैं और इसके आधार पर लोगों से गाली-गलौच भी करते हैं....ऐसा एक नहीं कई बार हुआ है कि किसी स्ट्रिंगर्स से ख़बर मिस हो गई तो उसे हटाने का फ़रमान जारी कर दिया गया- फ़ोन पर ही.... महिलाओं के सामने भी श्रीमान मां-बहन की गालियां देने लेगते हैं... क्यों- ताकि ख़ौफ़ कायम रहे..... ताकि आदमी ये पूछने में भी डरे कि सर मुझसे क्या ग़लती हो गई....
मैं जस्टिस काटजू से सहमत हूं कि पत्रकारिता में ज़्यादातर लोग कम पढ़े लिखे हैं. आखिर कई घंटे की नौकरी, ज़लालत से फ्रस्ट्रेशन और घटियापने की राजनीति के बाद किसे वक्त है कि अख़बार के सिवा कुछ पढ़ पाए.... लेकिन मुझे ये कहते हुए दुख होता है, शर्म आती है कि उससे भी ज़्यादा लोग नपुंसक हो गए हैं..... सवाल उठाने की विरोध करने की क्षमता ज़्यादातर खो चुके हैं..... ऐसे में अगर प्रेस परिषद इतना प्रभावी होता है कि वहां संपादकों-मालिकों के खिलाफ़ शिकायत की जा सके तो इसका स्वागत सबसे ज़्यादा पत्रकारीय जगत से ही होना चाहिए..... पर अफ़सोस की हममें इतनी हिम्मत भी नहीं बची है.....
Friday, November 18, 2011
Thursday, August 11, 2011
फटान
फटी हुई है.... बुरी तरह- फटी हुई है.... न बैठा जाता है, न खड़े रह पाते हैं और चलना-फिरना तो कhttp://www.blogger.com/img/blank.gifतई मुहाल हो गया है.... लेकिन फिर भी दौड़ना पड़ता है और नाचना पड़ता है.... क्योंकि हमारे तहखाने के बूढ़े आदमखोर को नौटंकी बहुत पसंद है... हमारे क्या हिंदी पत्रकारिता के सभी बूढ़े आदमखोरों को नौटंकी पसंद है.... भाषण देंगे पत्रकारिता की नैतिकता पर- लेकिन अपने ही अधीनस्थों को मौलिक अधिकार तक देना पसंद नहीं... लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ में सवाल पूछने की सख्त मनाही है... जी-जी, यस सर से आगे बढ़े तो आगे बढ़ने को (बाहर जाने को) ही कह दिया जाएगा.... हिंदी अख़बारों- चैनलों में काम कर रहे ज़्यादातर लोगों की मानसिक हालत सड़क किनारे कटने के इंतज़ार में पिंजरे में बंद मुर्गों सी होती है...http://www.blogger.com/img/blank.gif. पंख झड़ गए हैं- उम्मीद के, बांग लगाना भूल गए हैं- ज़्यादती के विरोध की और पिंजरे में अपनी बारी का इंतज़ार करते भूल गए हैं चलना- किसी नए विचार, किसी नए ख़्याल की ओर....
मेरी बात पर यकीन न हो तो भड़ास4मीडिया जैसी बेवसाइट्स पर पत्रकारों से जुड़ी ख़बरें, उनकी व्यथा पढ़िए.... ये गरीब हैं, डरे हुए हैं और किसी बाल श्रमिक की तरह असहाय हैं- जो न तो अपने हक की आवाज़ उठा सकते हैं, न एक साथ इकट्ठे हो सकते हैं, गालियां खाना- भूखे रहना जिन्हें अपनी किस्मत लगती है, जो ये नहीं समझ पा रहे कि जाएं तो जाएं कहां....
बहुत दुख की बात है- जो स्मार्ट हैं, मजबूत हैं, वो दलाल नज़र आते हैं....
जिस समाज का watchdog बीमार हो उस पर नज़र कौन रखेगा...
मेरी बात पर यकीन न हो तो भड़ास4मीडिया जैसी बेवसाइट्स पर पत्रकारों से जुड़ी ख़बरें, उनकी व्यथा पढ़िए.... ये गरीब हैं, डरे हुए हैं और किसी बाल श्रमिक की तरह असहाय हैं- जो न तो अपने हक की आवाज़ उठा सकते हैं, न एक साथ इकट्ठे हो सकते हैं, गालियां खाना- भूखे रहना जिन्हें अपनी किस्मत लगती है, जो ये नहीं समझ पा रहे कि जाएं तो जाएं कहां....
बहुत दुख की बात है- जो स्मार्ट हैं, मजबूत हैं, वो दलाल नज़र आते हैं....
जिस समाज का watchdog बीमार हो उस पर नज़र कौन रखेगा...
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आंखन देखी
Saturday, June 18, 2011
अगले चैनल मोहे स्ट्रिंगर न कीजो
नमस्कार, मैं आपसे मदद चाहता हूँ. माननीय हाईकोर्ट जबलपुर में पत्रकारों पर फर्जी मामले लादे जाने के विषय में मेरी एक शिकायत के जवाब में सिवनी पुलिस प्रशासन द्वारा कहा गया है कि स्ट्रिंगर पत्रकारों की श्रेणी में नही आते हैं. अर्थात स्ट्रिंगर पत्रकार नहीं होते हैं. ऐसी स्थिति में तो सभी चैनलों में काम करने वाले स्ट्रिंगरों के सामने उनकी पहचान पर प्रश्नचिन्ह लग गया है.
जबकि सारे न्यूज़ चैनल स्ट्रिंगरों को संवाददाता कह कर पुकारते हैं. हर फ़ोनो में संवाददाता कह कर ही सम्बोधित किया जाता है. मेरी आपसे प्रार्थना है कि प्रेस लाइन से जुड़े कानूनविदों से इस विषय पर सलाह लेकर मुझे मार्ग बतायें ताकि पूरे देश में काम कर रहे स्ट्रिंगर भाइयों के हित के लिए मैं माननीय हाईकोर्ट में अपना पक्ष रख सकूं.
राजेश स्थापक
सिवनी
देश के सबसे लोकप्रिय मीडिया पोर्टल भड़ास4मीडिया पर 21 मार्च, 2011 को ये अपील छपी थी.... तीन कमेंट आए जिनमें से एक रिपीट था.... राजेश जी को उनकी ज़रूरत की सलाह देने वाला कोई कमेंट तो कोई नहीं था लेकिन दोनों कमेंट हौसला बढ़ाने वाले ज़रूर थे....
सरकार क्या कर सकती है ये तो रामलीला मैदान कांड के बाद तो ये सवाल पूछा जाना बेमानी है.... लेकिन आज का मेरा विषय सरकार नहीं स्ट्रिंगर्स ही हैं....
अख़बार-टीवी की दुनिया में स्ट्रिंगर बेहद महत्वपूर्ण होते हैं..... अख़बार-टीवी की सत्तर फ़ीसदी तक रिपोर्टिंग स्ट्रिंगर्स ही करते हैं.... मुझे नहीं पता कि ये धारणा न जाने कहां से आई और अब तक लगातार कायम कैसे है कि स्ट्रिंगर्स ‘चालू’ होते हैं.... ‘चालू’ मायने वो ‘इधर-उधर’ से कमा लेते हैं- उन्हें पैसे की ज़रूरत नहीं होती.... वो तो बस आईडी या आईकार्ड चाहते हैं और फिर वारे न्यारे करते रहते हैं.....
न जाने स्ट्रिंगर्स को पैसे लेकर रखवाने और फिर सिर्फ़ रौब ग़ालिब करने के लिए उन्हें हटा देने की शर्मनाक प्रथा कैसे अब तक कायम है....
हो सकता है कि कुछ स्ट्रिंगर्स भी गड़बड़ करते हों.... लेकिन कौन सा अख़बार या चैनल ये दावा कर सकता है कि उसके स्टाफ़र करप्ट नहीं हैं...
मैं बहुत से ऐसे स्टाफ़र्स को निजी तौर पर जानता हूं (आप सभी जानते होंगे) जो करप्शन में नेताओं को टक्कर देते हैं... लेकिन वो एक के बाद दूसरे चैनल में ज़्यादा तरक्की (ज़्यादा पैसा-बड़ा पद) पा जाते हैं.... पत्रकारिता की शुचिता पर भाषण देते हैं.... और तो और ये भी बताते हैं कि कैसे नेता उनके सवालों से कांप जाते हैं (?????)….
ख़बरों से पैसा उगाहने या धंधा जमाने-बढ़ाने के लिए खुलने वाले अख़बार या चैनल पैसा लेकर स्ट्रिंगर्स रख रहे हैं- ये करीब-करीब तय हो चुका है.... मध्यम दर्जे के चैनल रिपोर्टर्स-स्ट्रिंगर्स को एड का टारगेट दे रहे हैं- ये हम सभी जानते हैं..... और बड़े चैनलों के बड़े पत्रकार बड़े मामलों की सैटिंग कर रहे हैं ये नीरा राडिया ने पूरी दुनिया को बता दिया है...
सहारा और साधना में काम करते हुए मैंने कुछ अच्छे रिपोर्टर्स को जाना है, ऐसे रिपोर्ट्स जो स्थान, वक्त और संस्थान की ज़रूरत के अनुसार स्ट्रिंगर हैं..... मेरठ में आशीष शर्मा स्ट्रिंगर था... बहुत अच्छा रिपोर्टर - न्यूज़ और विज़ुअल दोनों सेंस अच्छी थी और मेरठ से लौटने के बाद (रिपोर्टिंग असाइनमेंट से) मैंने साफ शब्दों में ये बात अपने सभी सीनियर्स को कही थी कि वो ज़्यादातर स्टाफर्स से बेहतर है.... हालांकि मुझे ये बात बाद में समझ आई कि नौकरी पाना हो सकता है कि किस्मत हो लेकिन नौकरी में तरक्की पाना पूरी तरह स्किल है.... आप काम कैसा करते हैं, कितने समर्पण से करते हैं, कितने विद्वान या दक्ष हैं- इसका तरक्की से कोई वास्ता नहीं.... आप तरक्की करने वाले को कैसे सेट कर पाते हैं- बस यही काउंट करता है....
मैं कुछ स्ट्रिंगर्स के नाम याद करता हूं तो सहारा के स्ट्रिंगर्स में से मेरठ में आशीष शर्मा (शायद अब भी वहीं है), बिजनौर में ज्योतिलाल शर्मा, इटावा में दिनेश शाक्य, मुगलसराय में चंद्रमौली केसरी, देहरादून में अजय राणा, रामनगर में गणेश रावत, बागेश्वर में हेमंत रावत, विकासनगर में कुंवर जावेद, रुड़की में ईश्वर चंद, रुद्रपुर में भरत शाह, रुद्रप्रयाग में बृजेश सती....
साधना के स्ट्रिंगर्स में से हरिद्वार में धर्मेंद्र चौधरी, कोटद्वार में राजगौरव नौटियाल, रुड़की में आरिफ़ नियाज़ी, रुद्रप्रयाग में सुनित चौधरी, गोपेश्वर में देवेंद्र रावत, उत्तरकाशी में सुभाष चंद्र, अल्मोड़ा में बृजेश तिवारी, धर्मशाला में अनूप धीमान, किन्नौर में विशेषर नेगी, मंडी में अंकुश सूद.... के अलावा और भी बहुत से ऐसे साथी होंगे जिनके नाम अभी याद नहीं आ रहे....
इन सभी के बारे में मैं दावा कर सकता हूं कि ये बहुत अच्छे रिपोर्टर हैं और ये स्ट्रिंगर के नाम पर होने वाले शोषण, अपमान से मुक्त होने के हकदार हैं.....
ज़्यादातर स्ट्रिंगर हमेशा आर्थिक अनिश्चितता से जूझते रहते हैं.... एक स्ट्रिंगर ने एक बार मुझसे कहा था कि- सर चाहे पांच हज़ार महीने का मिले लेकिन प्लीज़ ऐसा कुछ करें कि ये हर महीने मिल जाए..... उधार करते-करते शर्म आने लगती है.....
लेकिन अब तो पुलिस और प्रशासन तक इनसे भेदभाव करने लगे हैं..... सिर्फ़ सिवनी के राजेश का ये दर्द नहीं है.... कई जगह अधिकारी रिपोर्टर्स से समूह से पूछने लगे हैं कि कौन स्टाफ़र है और कौन स्ट्रिंगर.... और दोनों से अलग बर्ताव भी करने लगे हैं.....
भड़ास में ही अगर आप स्ट्रिंगर सर्च करें तो आपको स्ट्रिंगर्स का दर्द नज़र आएगा..... हममें से बहुत सारे लोग अभी इन स्ट्रिंगर्स के लिए कुछ ठोस करने की स्थिति में नहीं होंगे.... लेकिन मैं अपने सभी साथियों से आग्रह करूंगा कि वो कम से कम स्ट्रिंगर्स को उसके पद के बजाय पत्रकारिता के ज्ञान और समर्पण के आधार पर तोलें.... हमारी मानसिकता बदलेगी तो ज़रूर कुछ बदलेगा......
जबकि सारे न्यूज़ चैनल स्ट्रिंगरों को संवाददाता कह कर पुकारते हैं. हर फ़ोनो में संवाददाता कह कर ही सम्बोधित किया जाता है. मेरी आपसे प्रार्थना है कि प्रेस लाइन से जुड़े कानूनविदों से इस विषय पर सलाह लेकर मुझे मार्ग बतायें ताकि पूरे देश में काम कर रहे स्ट्रिंगर भाइयों के हित के लिए मैं माननीय हाईकोर्ट में अपना पक्ष रख सकूं.
राजेश स्थापक
सिवनी
देश के सबसे लोकप्रिय मीडिया पोर्टल भड़ास4मीडिया पर 21 मार्च, 2011 को ये अपील छपी थी.... तीन कमेंट आए जिनमें से एक रिपीट था.... राजेश जी को उनकी ज़रूरत की सलाह देने वाला कोई कमेंट तो कोई नहीं था लेकिन दोनों कमेंट हौसला बढ़ाने वाले ज़रूर थे....
सरकार क्या कर सकती है ये तो रामलीला मैदान कांड के बाद तो ये सवाल पूछा जाना बेमानी है.... लेकिन आज का मेरा विषय सरकार नहीं स्ट्रिंगर्स ही हैं....
अख़बार-टीवी की दुनिया में स्ट्रिंगर बेहद महत्वपूर्ण होते हैं..... अख़बार-टीवी की सत्तर फ़ीसदी तक रिपोर्टिंग स्ट्रिंगर्स ही करते हैं.... मुझे नहीं पता कि ये धारणा न जाने कहां से आई और अब तक लगातार कायम कैसे है कि स्ट्रिंगर्स ‘चालू’ होते हैं.... ‘चालू’ मायने वो ‘इधर-उधर’ से कमा लेते हैं- उन्हें पैसे की ज़रूरत नहीं होती.... वो तो बस आईडी या आईकार्ड चाहते हैं और फिर वारे न्यारे करते रहते हैं.....
न जाने स्ट्रिंगर्स को पैसे लेकर रखवाने और फिर सिर्फ़ रौब ग़ालिब करने के लिए उन्हें हटा देने की शर्मनाक प्रथा कैसे अब तक कायम है....
हो सकता है कि कुछ स्ट्रिंगर्स भी गड़बड़ करते हों.... लेकिन कौन सा अख़बार या चैनल ये दावा कर सकता है कि उसके स्टाफ़र करप्ट नहीं हैं...
मैं बहुत से ऐसे स्टाफ़र्स को निजी तौर पर जानता हूं (आप सभी जानते होंगे) जो करप्शन में नेताओं को टक्कर देते हैं... लेकिन वो एक के बाद दूसरे चैनल में ज़्यादा तरक्की (ज़्यादा पैसा-बड़ा पद) पा जाते हैं.... पत्रकारिता की शुचिता पर भाषण देते हैं.... और तो और ये भी बताते हैं कि कैसे नेता उनके सवालों से कांप जाते हैं (?????)….
ख़बरों से पैसा उगाहने या धंधा जमाने-बढ़ाने के लिए खुलने वाले अख़बार या चैनल पैसा लेकर स्ट्रिंगर्स रख रहे हैं- ये करीब-करीब तय हो चुका है.... मध्यम दर्जे के चैनल रिपोर्टर्स-स्ट्रिंगर्स को एड का टारगेट दे रहे हैं- ये हम सभी जानते हैं..... और बड़े चैनलों के बड़े पत्रकार बड़े मामलों की सैटिंग कर रहे हैं ये नीरा राडिया ने पूरी दुनिया को बता दिया है...
सहारा और साधना में काम करते हुए मैंने कुछ अच्छे रिपोर्टर्स को जाना है, ऐसे रिपोर्ट्स जो स्थान, वक्त और संस्थान की ज़रूरत के अनुसार स्ट्रिंगर हैं..... मेरठ में आशीष शर्मा स्ट्रिंगर था... बहुत अच्छा रिपोर्टर - न्यूज़ और विज़ुअल दोनों सेंस अच्छी थी और मेरठ से लौटने के बाद (रिपोर्टिंग असाइनमेंट से) मैंने साफ शब्दों में ये बात अपने सभी सीनियर्स को कही थी कि वो ज़्यादातर स्टाफर्स से बेहतर है.... हालांकि मुझे ये बात बाद में समझ आई कि नौकरी पाना हो सकता है कि किस्मत हो लेकिन नौकरी में तरक्की पाना पूरी तरह स्किल है.... आप काम कैसा करते हैं, कितने समर्पण से करते हैं, कितने विद्वान या दक्ष हैं- इसका तरक्की से कोई वास्ता नहीं.... आप तरक्की करने वाले को कैसे सेट कर पाते हैं- बस यही काउंट करता है....
मैं कुछ स्ट्रिंगर्स के नाम याद करता हूं तो सहारा के स्ट्रिंगर्स में से मेरठ में आशीष शर्मा (शायद अब भी वहीं है), बिजनौर में ज्योतिलाल शर्मा, इटावा में दिनेश शाक्य, मुगलसराय में चंद्रमौली केसरी, देहरादून में अजय राणा, रामनगर में गणेश रावत, बागेश्वर में हेमंत रावत, विकासनगर में कुंवर जावेद, रुड़की में ईश्वर चंद, रुद्रपुर में भरत शाह, रुद्रप्रयाग में बृजेश सती....
साधना के स्ट्रिंगर्स में से हरिद्वार में धर्मेंद्र चौधरी, कोटद्वार में राजगौरव नौटियाल, रुड़की में आरिफ़ नियाज़ी, रुद्रप्रयाग में सुनित चौधरी, गोपेश्वर में देवेंद्र रावत, उत्तरकाशी में सुभाष चंद्र, अल्मोड़ा में बृजेश तिवारी, धर्मशाला में अनूप धीमान, किन्नौर में विशेषर नेगी, मंडी में अंकुश सूद.... के अलावा और भी बहुत से ऐसे साथी होंगे जिनके नाम अभी याद नहीं आ रहे....
इन सभी के बारे में मैं दावा कर सकता हूं कि ये बहुत अच्छे रिपोर्टर हैं और ये स्ट्रिंगर के नाम पर होने वाले शोषण, अपमान से मुक्त होने के हकदार हैं.....
ज़्यादातर स्ट्रिंगर हमेशा आर्थिक अनिश्चितता से जूझते रहते हैं.... एक स्ट्रिंगर ने एक बार मुझसे कहा था कि- सर चाहे पांच हज़ार महीने का मिले लेकिन प्लीज़ ऐसा कुछ करें कि ये हर महीने मिल जाए..... उधार करते-करते शर्म आने लगती है.....
लेकिन अब तो पुलिस और प्रशासन तक इनसे भेदभाव करने लगे हैं..... सिर्फ़ सिवनी के राजेश का ये दर्द नहीं है.... कई जगह अधिकारी रिपोर्टर्स से समूह से पूछने लगे हैं कि कौन स्टाफ़र है और कौन स्ट्रिंगर.... और दोनों से अलग बर्ताव भी करने लगे हैं.....
भड़ास में ही अगर आप स्ट्रिंगर सर्च करें तो आपको स्ट्रिंगर्स का दर्द नज़र आएगा..... हममें से बहुत सारे लोग अभी इन स्ट्रिंगर्स के लिए कुछ ठोस करने की स्थिति में नहीं होंगे.... लेकिन मैं अपने सभी साथियों से आग्रह करूंगा कि वो कम से कम स्ट्रिंगर्स को उसके पद के बजाय पत्रकारिता के ज्ञान और समर्पण के आधार पर तोलें.... हमारी मानसिकता बदलेगी तो ज़रूर कुछ बदलेगा......
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