<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963</id><updated>2011-12-05T05:04:28.084-08:00</updated><category term='दोस्तों के नाम'/><category term='तजवीज़'/><category term='मेरी जादू की पुड़िया'/><category term='ख़बर-ख़बर'/><category term='अपमान'/><category term='आंखन देखी'/><category term='अमर उजाला (99-03) के दौरान लिखी गई जब सहारा में हो गया था'/><category term='यूं ही'/><category term='फोटुआं'/><title type='text'>सोतड़ू</title><subtitle type='html'>आराम बड़ी चीज़ है...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>37</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-3101244297576702466</id><published>2011-11-18T03:45:00.000-08:00</published><updated>2011-11-19T02:13:56.699-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आंखन देखी'/><title type='text'>जस्टिस काटजू से दिक्कत क्यों ?</title><content type='html'>जस्टिस काटजू से एडिटर्स नाराज़ हैं (सभी पत्रकार नहीं)।  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्वयंभू झंडाबरदार बीएई एकदम हल्लाबोल की मुद्रा में है . . .  पर क्यों- आखिर - भय बिन होत प्रीत न - पर ऐतराज़ क्या है. . .  इसी सिद्धांत पर तो सारे न्यूज़ चैनल (कम से कम हिंदी के) चल रहे हैं . . .  हर एडिटर सर्वेसर्वा है- जब चाहे जिसे चाहे ज़लील करे और विरोध पर निकाल फेंके.... संदेश साफ़ है नौकरी करनी है तो डर के करो वरना बाहर....  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप चाहें तो इस सच से इनकार भी कह सकते हैं...  बहरहाल साधना न्यूज़ में नौकरी के दौरान मैं अपने साथियों (सामान्यतः आउटपुट, इनपुट  इंचार्ज, पीसीआर हेड) से कहता था कि चाहे तो आप अधिकारी होने का भ्रम पाल सकते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इन चैनलों में सिर्फ़ एक ही अधिकारी होता है और बाकी सब चपरासी..... वो पीडी हों या एनके हों- जब चाहे किसी की भी पैंट न्यूज़रूम में उतार सकते थे/हैं, उतारते रहे हैं..... अब कुछ लोग ये स्वीकार करने लगे हैं, कुछ अब भी भ्रम में जीते हैं कि-  नहीं जी आज तक हमको ऐसा नहीं कहा- एकबारगी मान भी लें, तो कोई गारंटी नहीं कि आगे भी नहीं कहा जाएगा...... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी न्यूज़ में साढ़े आठ साल काम करने के दौरान मैंने एक बात साफ़ समझ ली- कि ये चैनल ईगो पर चल रहे हैं, सिर्फ ईगो पर . . . न कोई सिस्टम- न सिद्धांत, बस एडिटर का ईगो . . . इन चैनलों में काम करने वाले लोग, ख़ासतौर पर एडिटोरियल के- हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं...... बाकी विभागों के साथ कोई दिक्कत नहीं- वो नौकरी कर रहे हैं, प्रेस के आईकार्ड से क्षमतानुसार फ़ायदे उठा रहे हैं.... लेकिन एडिटोरियल पर पत्रकारिता का दबाव भी है.... पत्रकार का लेबल लगने भर से ही इंटर्न भी दबाव में आ जाता है.... उसे समाज में (गैर पत्रकारीय) सम्मान से देखा जाने लगता है और बहुत जल्द ही वो खुद को दूसरों से थोड़ा 'ऊपर'  महसूस करने लगता है.... लेकिन न्यूज़रूम में आते है उसे बता दिया जाता है कि वो कितना नीचे है.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो अक्सर जब तक आदमी को समझ आता है कि अब यहां पत्रकारिता या ग्लैमर (जो जिस वजह से आया  हो) नहीं है तब तक अक्सर वो इतना वक्त इसमें लगा चुका होता है कि बाहर निकलना संभव नहीं हो पाता.... फिर वो बस सिस्टम का एक पुर्जा बनकर रह जाता है... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और ये सिस्टम बहुत ज़ालिम और दोगला है.... दो दिन पहले जस्टिस काटजू के साथ बैठक का विरोध करने वालों में दैनिक जागरण के संजय गुप्ता और पंजाब केसरी के अश्विनी कुमार भी थे....  जागरण तो नहीं लेकिन मैंने पंजाब केसरी में काम किया है.... पहली नौकरी पंजाब केसरी, जालंधर में ही मिली थी.... मैं कह सकता हूं कि हिंदी में पेड न्यूज़ का खुला खेल शुरू इसी अख़बार में शुरू किया होगा.... पत्रकारों के शोषण के कीर्तिमान भी इसी ने रचे होंगे..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मुझे इन बनियों से ज़्यादा शिकायत भी नहीं है.... वो धंधा करने उतरे हैं... कोयले से ज़्यादा फ़ायदा ख़बरों में दिखा तो इसी में लग गए- दूसरी पीढ़ी ने संपादक का चोला ओढ़ा तो संपादकों वाली बोली भी बोलने लगे- और ये कोई मुश्किल काम नहीं....  संपादक कौन सा वही बोलता है जो करता है.... वो भी तो वही करता है जो ये मालिक-संपादक करते हैं.... मालिक संपादक नहीं तो संपादक वही करता है जो मालिक चाहता है..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजीठिया आयोग की सिफा़रिशें आईं तो अख़बार मालिक बेचैन हो गए... बिसूरने लगे कि हम तो लुट जाएंगे... हालांकि हर साल नए मॉडल की गाड़ी उनके घर आती है.... लेकिन कोई संपादक झंडा लेकर ऐसे खड़ा नहीं हुआ जैसे जस्टिस काटजू के खिलाफ़ खड़े हो गए हैं..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल संपादकों, मालिकों की दिक्कत ये है कि वो भय बिन प्रीत न होत को सही तो मानते हैं और उस पर अमल भी करते हैं लेकिन सिर्फ़ वहीं तक जहां तक उनका भय कायम रहे....जब कोई और उन्हें नियमों में रहने, जवाबदेह होने का डंडा दिखाता है तो ये फाउल-फाउल चिल्लाने लगे हैं..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीईए में शामिल  एक स्वनामधन्य  एडिटर से बड़े न्यूज़ चैनल का एक छोटा सा उदाहरण..... एक स्वनामधन्य एंकर कम वैरी सीनियर प्रोड्यूसर ने प्रोग्रामिंग हेड से एक लड़के की शिकायत की कि वो उन्हें नमस्ते नहीं करता जबकि वो उन्हीं के प्रोग्राम की टीम में है.....  सिर्फ़ शिकायत ही नहीं की मोहतरमा उस घमंडी लड़के को निकालने पर अड़ गईं..... प्रोग्रामिंग हेड ने उस लड़के से पूछा कि क्या यह सच है- उसने कहा कि जी आप हमारे इंचार्ज हैं, मैं आपको नमस्ते  करता हूं..... बस प्रोग्रामिंग हेड ने उसे कह दिया कि कल से आने की ज़रूरत नहीं है..... न उन्होंने मैडम एंकर से ये पूछा कि काम में तो कोई दिक्कत नहीं, अनुशासनहीन तो नहीं..... न ही लड़के की किसी और बात को सुना- मैडम को नमस्ते नहीं करते- तो मत आना....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीईए में शामिल एक और स्वनामधन्य एडिटर महोदय जो आजकल शायद सिर्फ़ काटजू विरोध पर जी रहे हैं के बारे में भी सुनिए..... पत्रकारिता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले महोदय का सबसे प्रिय शगल है अपने जूनियर्स को ज़लील करना..... एडिटोरियल मीटिंग्स से पहले सबसे ज़्यादा अटकल इसी बात पर रहती है कि आज  किसकी लगेगी..... आदिवासियों के देवताओं सरीखे टीआरपी सिस्टम की श्रीमान आलोचना भी करते हैं और इसके आधार पर लोगों से गाली-गलौच भी करते हैं....ऐसा एक नहीं कई बार हुआ है कि किसी स्ट्रिंगर्स से ख़बर मिस हो गई तो उसे हटाने का फ़रमान जारी कर दिया गया- फ़ोन पर ही.... महिलाओं के सामने भी श्रीमान मां-बहन की गालियां देने लेगते हैं...  क्यों- ताकि ख़ौफ़ कायम रहे..... ताकि आदमी ये पूछने में भी डरे कि सर मुझसे क्या ग़लती हो गई.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जस्टिस काटजू से सहमत हूं कि पत्रकारिता में ज़्यादातर लोग कम पढ़े लिखे हैं. आखिर कई घंटे की नौकरी, ज़लालत से फ्रस्ट्रेशन और घटियापने की राजनीति के बाद किसे वक्त है कि अख़बार के सिवा कुछ पढ़ पाए.... लेकिन मुझे ये कहते हुए दुख होता है, शर्म आती है कि उससे भी ज़्यादा लोग नपुंसक हो गए हैं.....  सवाल उठाने की विरोध करने की क्षमता ज़्यादातर खो चुके हैं..... ऐसे में अगर प्रेस परिषद इतना प्रभावी होता है कि वहां संपादकों-मालिकों के खिलाफ़ शिकायत की जा सके तो इसका स्वागत सबसे ज़्यादा पत्रकारीय जगत से ही होना चाहिए..... पर अफ़सोस की हममें इतनी हिम्मत भी नहीं बची है.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-3101244297576702466?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/3101244297576702466/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=3101244297576702466&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/3101244297576702466'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/3101244297576702466'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='जस्टिस काटजू से दिक्कत क्यों ?'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-11341957951667985</id><published>2011-08-11T07:00:00.000-07:00</published><updated>2011-08-11T07:15:40.854-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आंखन देखी'/><title type='text'>फटान</title><content type='html'>फटी हुई है.... बुरी तरह- फटी हुई है.... न बैठा जाता है, न खड़े रह पाते हैं और चलना-फिरना तो कhttp://www.blogger.com/img/blank.gifतई मुहाल हो गया है.... लेकिन फिर भी दौड़ना पड़ता है और नाचना पड़ता है.... क्योंकि हमारे &lt;a href="http://sotadu.blogspot.com/2010/10/blog-post_11.html"&gt;तहखाने के बूढ़े आदमखोर&lt;/a&gt; को नौटंकी बहुत पसंद है... हमारे क्या हिंदी पत्रकारिता के सभी बूढ़े आदमखोरों को नौटंकी पसंद है.... भाषण देंगे पत्रकारिता की नैतिकता पर- लेकिन अपने ही अधीनस्थों को मौलिक अधिकार तक देना पसंद नहीं... लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ में सवाल पूछने की सख्त मनाही है... जी-जी, यस सर से आगे बढ़े तो आगे बढ़ने को (बाहर जाने को) ही कह दिया जाएगा.... हिंदी अख़बारों- चैनलों में काम कर रहे ज़्यादातर लोगों की मानसिक हालत सड़क किनारे कटने के इंतज़ार में पिंजरे में बंद मुर्गों सी होती है...http://www.blogger.com/img/blank.gif. पंख झड़ गए हैं- उम्मीद के, बांग लगाना भूल गए हैं- ज़्यादती के विरोध की और पिंजरे में अपनी बारी का इंतज़ार करते भूल गए हैं चलना- किसी नए विचार, किसी नए ख़्याल की ओर....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात पर यकीन न हो तो भड़ास4मीडिया जैसी बेवसाइट्स पर पत्रकारों से जुड़ी ख़बरें, उनकी &lt;a href="http://bhadas4media.com/tv/12460---------4.html"&gt;व्यथा&lt;/a&gt; पढ़िए.... ये गरीब हैं, डरे हुए हैं और किसी बाल श्रमिक की तरह असहाय हैं- जो न तो अपने हक की आवाज़ उठा सकते हैं, न एक साथ इकट्ठे हो सकते हैं, गालियां खाना- भूखे रहना जिन्हें अपनी किस्मत लगती है, जो ये नहीं समझ पा रहे कि जाएं तो जाएं कहां.... &lt;br /&gt;बहुत दुख की बात है- जो स्मार्ट हैं, मजबूत हैं, वो दलाल नज़र आते हैं.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस समाज का watchdog बीमार हो उस पर नज़र कौन रखेगा... &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-11341957951667985?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/11341957951667985/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=11341957951667985&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/11341957951667985'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/11341957951667985'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='फटान'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-3037515888065001931</id><published>2011-06-18T06:33:00.001-07:00</published><updated>2011-06-18T06:36:23.711-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आंखन देखी'/><title type='text'>अगले चैनल मोहे स्ट्रिंगर न कीजो</title><content type='html'>नमस्कार, मैं आपसे मदद चाहता हूँ. माननीय हाईकोर्ट जबलपुर में पत्रकारों पर फर्जी मामले लादे जाने के विषय में मेरी एक शिकायत के जवाब में सिवनी पुलिस प्रशासन द्वारा कहा गया है कि स्ट्रिंगर पत्रकारों की श्रेणी में नही आते हैं. अर्थात स्ट्रिंगर पत्रकार नहीं होते हैं. ऐसी स्थिति में तो सभी चैनलों में काम करने वाले स्ट्रिंगरों के सामने उनकी पहचान पर प्रश्नचिन्ह लग गया है.&lt;br /&gt;जबकि सारे न्यूज़ चैनल स्ट्रिंगरों को संवाददाता कह कर पुकारते हैं. हर फ़ोनो में संवाददाता कह कर ही सम्बोधित किया जाता है. मेरी आपसे प्रार्थना है कि प्रेस लाइन से जुड़े कानूनविदों से इस विषय पर सलाह लेकर मुझे मार्ग बतायें ताकि पूरे देश में काम कर रहे स्ट्रिंगर भाइयों के हित के लिए मैं माननीय हाईकोर्ट में अपना पक्ष रख सकूं.&lt;br /&gt;राजेश स्थापक &lt;br /&gt;सिवनी &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;देश के सबसे लोकप्रिय मीडिया पोर्टल भड़ास4मीडिया पर 21 मार्च, 2011 को ये अपील छपी थी.... तीन कमेंट आए जिनमें से एक रिपीट था.... राजेश जी को उनकी ज़रूरत की सलाह देने वाला कोई कमेंट तो कोई नहीं था लेकिन दोनों कमेंट हौसला बढ़ाने वाले ज़रूर थे.... &lt;br /&gt;सरकार क्या कर सकती है ये तो रामलीला मैदान कांड के बाद तो ये सवाल पूछा जाना बेमानी है.... लेकिन आज का मेरा विषय सरकार नहीं स्ट्रिंगर्स ही हैं.... &lt;br /&gt;अख़बार-टीवी की दुनिया में स्ट्रिंगर बेहद महत्वपूर्ण होते हैं..... अख़बार-टीवी की सत्तर फ़ीसदी तक रिपोर्टिंग स्ट्रिंगर्स ही करते हैं.... मुझे नहीं पता कि ये धारणा न जाने कहां से आई और अब तक लगातार कायम कैसे है कि स्ट्रिंगर्स ‘चालू’ होते हैं.... ‘चालू’ मायने वो ‘इधर-उधर’ से कमा लेते हैं- उन्हें पैसे की ज़रूरत नहीं होती.... वो तो बस आईडी या आईकार्ड चाहते हैं और फिर वारे न्यारे करते रहते हैं..... &lt;br /&gt;न जाने स्ट्रिंगर्स को पैसे लेकर रखवाने और फिर सिर्फ़ रौब ग़ालिब करने के लिए उन्हें हटा देने की शर्मनाक प्रथा कैसे अब तक कायम है.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है कि कुछ स्ट्रिंगर्स भी गड़बड़ करते हों.... लेकिन कौन सा अख़बार या चैनल ये दावा कर सकता है कि उसके स्टाफ़र करप्ट नहीं हैं... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बहुत से ऐसे स्टाफ़र्स को निजी तौर पर जानता हूं (आप सभी जानते होंगे) जो करप्शन में नेताओं को टक्कर देते हैं... लेकिन वो एक के बाद दूसरे चैनल में ज़्यादा तरक्की (ज़्यादा पैसा-बड़ा पद) पा जाते हैं.... पत्रकारिता की शुचिता पर भाषण देते हैं.... और तो और ये भी बताते हैं कि कैसे नेता उनके सवालों से कांप जाते हैं (?????)….  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़बरों से पैसा उगाहने या धंधा जमाने-बढ़ाने के लिए खुलने वाले अख़बार या चैनल पैसा लेकर स्ट्रिंगर्स रख रहे हैं- ये करीब-करीब तय हो चुका है.... मध्यम दर्जे के चैनल रिपोर्टर्स-स्ट्रिंगर्स को एड का टारगेट दे रहे हैं- ये हम सभी जानते हैं..... और बड़े चैनलों के बड़े पत्रकार बड़े मामलों की सैटिंग कर रहे हैं ये नीरा राडिया ने पूरी दुनिया को बता दिया है... &lt;br /&gt;सहारा और साधना में काम करते हुए मैंने कुछ अच्छे रिपोर्टर्स को जाना है, ऐसे रिपोर्ट्स जो  स्थान, वक्त और संस्थान की ज़रूरत के अनुसार स्ट्रिंगर हैं..... मेरठ में आशीष शर्मा स्ट्रिंगर था... बहुत अच्छा रिपोर्टर - न्यूज़ और विज़ुअल दोनों सेंस अच्छी थी और मेरठ से लौटने के बाद (रिपोर्टिंग असाइनमेंट से) मैंने साफ शब्दों में ये बात अपने सभी सीनियर्स को कही थी कि वो ज़्यादातर स्टाफर्स से बेहतर है.... हालांकि मुझे ये बात बाद में समझ आई कि नौकरी पाना हो सकता है कि किस्मत हो लेकिन नौकरी में तरक्की पाना पूरी तरह स्किल है.... आप काम कैसा करते हैं, कितने समर्पण से करते हैं, कितने विद्वान या दक्ष हैं- इसका तरक्की से कोई वास्ता नहीं.... आप तरक्की करने वाले को कैसे सेट कर पाते हैं- बस यही काउंट करता है.... &lt;br /&gt;मैं कुछ स्ट्रिंगर्स के नाम याद करता हूं तो सहारा के स्ट्रिंगर्स में से मेरठ में आशीष शर्मा (शायद अब भी वहीं है), बिजनौर में ज्योतिलाल शर्मा, इटावा में दिनेश शाक्य, मुगलसराय में चंद्रमौली केसरी, देहरादून में अजय राणा, रामनगर में गणेश रावत, बागेश्वर में हेमंत रावत, विकासनगर में कुंवर जावेद, रुड़की में ईश्वर चंद, रुद्रपुर में भरत शाह, रुद्रप्रयाग में बृजेश सती.... &lt;br /&gt;साधना के स्ट्रिंगर्स में से हरिद्वार में धर्मेंद्र चौधरी, कोटद्वार में राजगौरव नौटियाल, रुड़की में आरिफ़ नियाज़ी, रुद्रप्रयाग में सुनित चौधरी, गोपेश्वर में देवेंद्र रावत, उत्तरकाशी में सुभाष चंद्र, अल्मोड़ा में बृजेश तिवारी, धर्मशाला में अनूप धीमान, किन्नौर में विशेषर नेगी, मंडी में अंकुश सूद.... के अलावा और भी बहुत से ऐसे साथी होंगे जिनके नाम अभी याद नहीं आ रहे.... &lt;br /&gt;इन सभी के बारे में मैं दावा कर सकता हूं कि ये बहुत अच्छे रिपोर्टर हैं और ये स्ट्रिंगर के नाम पर होने वाले शोषण, अपमान से मुक्त होने के हकदार हैं..... &lt;br /&gt;ज़्यादातर स्ट्रिंगर हमेशा आर्थिक अनिश्चितता से जूझते रहते हैं.... एक स्ट्रिंगर ने एक बार मुझसे कहा था कि- सर चाहे पांच हज़ार महीने का मिले लेकिन प्लीज़ ऐसा कुछ करें कि ये हर महीने मिल जाए..... उधार करते-करते शर्म आने लगती है..... &lt;br /&gt;लेकिन अब तो पुलिस और प्रशासन तक इनसे भेदभाव करने लगे हैं..... सिर्फ़ सिवनी के राजेश का ये दर्द नहीं है.... कई जगह अधिकारी रिपोर्टर्स से समूह से पूछने लगे हैं कि कौन स्टाफ़र है और कौन स्ट्रिंगर.... और दोनों से अलग बर्ताव भी करने लगे हैं..... &lt;br /&gt;भड़ास में ही अगर आप स्ट्रिंगर सर्च करें तो आपको स्ट्रिंगर्स का दर्द नज़र आएगा..... हममें से बहुत सारे लोग अभी इन स्ट्रिंगर्स के लिए कुछ ठोस करने की स्थिति में नहीं होंगे.... लेकिन  मैं अपने सभी साथियों से आग्रह करूंगा कि वो कम से कम स्ट्रिंगर्स को उसके पद के बजाय पत्रकारिता के ज्ञान और समर्पण के आधार पर तोलें.... हमारी मानसिकता बदलेगी तो ज़रूर कुछ  बदलेगा......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-3037515888065001931?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/3037515888065001931/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=3037515888065001931&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/3037515888065001931'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/3037515888065001931'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='अगले चैनल मोहे स्ट्रिंगर न कीजो'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-6344279243501723903</id><published>2011-04-15T00:21:00.000-07:00</published><updated>2011-04-15T00:34:25.758-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आंखन देखी'/><title type='text'>संवेदना अपनी-अपनी</title><content type='html'>अरुणिमा सिन्हा उर्फ़ सोनू सिन्हा पर लंSSSSSबा भाषण सुना.... बहुत चिंता जताई गई कि संवेदनहीन हो रहा है समाज.... शर्म ज़ाहिर की गई, थू-थू किया गया.... समाज को बार-बार बोलकर सीख दी गई... चेतावनी दी गई कि सीख लो मूर्खों वरना देश तरक्की नहीं कर पाएगा... संवेदनशील बनो, संवेदनशील बनो, संवेदना के बिना आदमी इंसान नहीं लाश है- जिंदा चलती-फिरती लाश &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अभीभूत हो ही गया था... करीब-करीब हो ही गया था, लेकिन याद आया... याद आया कि कि अभीभूत नहीं होना है- भाषण को याद करना है और सामने पड़ने पर प्रशंसात्मक स्वर में रख देना है... अभीभूत होने का दिखावा करना है... कहना है कि सही कहा सर- संवेदनहीन हो रहा है समाज.... लेकिन संवेदनशील होना नहीं है, बिल्कुल नहीं होना- अगर नौकरी बचानी है तो....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचो कि अगर रास्ते में एक्सीडेंट हो जाए और आप रुक जाएं मदद करने के लिए... फिर क्या होगा... आदमी बचेगा या नहीं यह तो पता नहीं..... पर एक बात तो तय है कि आप ऑफ़िस पहुंचने में लेट हो जाएंगे.... लेट हो जाएंगे तो यहां भी एक्सीडेंट होगा.... बॉस का मूड ख़राब होगा- सुबह-सुबह पॉलिश किया गया चेहरा विकृत हो जाएगा.... तमीज चली जाएगी तेल लेने और वो घिनाते स्वर में आपको बताएगा कि काम के प्रति समर्पण नहीं है तुममें.... पत्रकारिता समर्पण मांगता है... संवेदनशीलता नहीं..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझ लो कि संवेदना जगे तो सिर्फ़ इसलिए कि शेव करते हुए बॉस का चेहरा थोड़ा कट गया..... इसलिए भावुक नहीं होना कि घर में बेटी बीमार है- डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी हो गया है.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्रेन में सोनू पर हमला हुआ सब चुप रहे.... इसमें आश्चर्य की क्या बात है.... &lt;br /&gt;पड़ोसी बीमार पड़ जाए तो आप परेशान हो जाते हैं कि साला अस्पताल जाना पड़ेगा..... &lt;br /&gt;सालों बाद कोई दोस्त मिल जाए तो उससे कहना पड़ता है कि भाई रात को घर आना और सुबह चले जाना.... समझा करो इस नौकरी में दोस्ती नहीं होती.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्ती तो फिर दूर की बात है.... इस नौकरी में तो परिवार को भी भूल ही जाना पड़ेगा.... बीवी बीमार हो तो, बेटी बीमार हो तो, आप ख़ुद बीमार हों तो भी- डॉक्टर को दिखाने के लिए भी कई बार सोचना पड़ेगा- कई डायलॉग सुनने के लिए खुद को तैयार करना पड़ेगा.... पत्रकारिता में नौकरी करनी है तो- न काहू से दोस्ती, न काहू से प्यार की स्थिति को प्राप्त होना पडेगा..... अपने प्रति भी संवेदनाओं को मारना पड़ेगा.... ज़िंदा लाश बनना पड़ेगा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा लग रहा होगा कि ज्यादा बोल रहा हूं..... तो ये किस्सा सुनो.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो महीने भर पहले मुंहअंधेरे (करीब पौने छे बजे) मेरी बीवी की गाड़ी से एक्सीडेंट हो गया.... नोएडा- सेक्टर 12 मेट्रो हॉस्पिटल से कुछ पहले 21-22 साल का एक लड़का नाइट शिफ्ट कर लौट रहा था- गाड़ी से टकरा गया.... विंड स्क्रीन पूरी तरह टूट गई, गाड़ी साइड से पिचक गई.... तो सोचो लड़के का क्या हाल हुआ होगा.... हाथ में, छाती में, सिर पर चोट लगी.... सुन कर मैं इंदिरापुरम से दौड़ा-दौड़ा आया.... सहारा के कुछ लोग पहले ही पहुंच चुके थे..... लड़के को प्राथमिक उपचार मेरे पहुंचने से पहले ही दिया जा चुका था.... लेकिन डॉक्टर कुछ कहने को तैयार नहीं थे..... वक्त लगा.... एक्सरे हुआ, एमआरआई हुआ और करीब चार-साढ़े चार घंटे बाद डॉक्टरों ने लड़के के भाई को उसे घर ले जाने की इजाज़त दे दी....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांच घंटे के इस वक्त के दौरान मेरी बीवी तो बेहद तनाव में रही ही- मैं भी सामान्य दिखने की नाकाम कोशिश करता रहा..... ये तनाव हावी रहा कि अगर इस लड़के को कुछ हो गया तो.... तो क्या होगा.... एक जवान लड़के की मौत से क्या आप आसानी से  हाथ झाड़कर निकल सकते हैं??? नहीं बिल्कुल नहीं..... &lt;br /&gt;अब भी लगता है कि मान लो उस लड़के की मौत हो जाती और किसी तरह कानून के फंदे से निकल जाते तो.... तो भी क्या आप खुद को माफ़ कर पाते.... शायद कभी नहीं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उस दिन यकीनन मैं ऑफ़िस वक्त पर नहीं पहुंच पाया.... आया लेकिन ढाई-तीन घंटे लेट.... यहां आकर मुझे सहानुभूति नहीं- फटकार मिली..... पत्रकारिता पर अर्थहीन भाषण मिला.... बताया गया कि कोई मरे या जिये- बॉस के दिए वक्त पर हाजिरी बजाना ही परम कर्तव्य होना चाहिए..... साथियों ने बताया कि मीटिंग में भी घृणा भरकर पूछा गया कि इसे (मुझे) इतनी भी तमीज नहीं कि मीटिंग में आना ज़रूरी है या अस्पताल जाना (!!!!!) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक साथी की चाची मर गई.... पता चला कि नहीं आ पाया.... संवेदनशीलता की मिसाल देखिए- आजकल बहुत चाची-मामी मर रही हैं लोगों की.... ज़्यादा छुट्टियां चाहिएं तो.... (बोलते-बोलते रह गए शायद कि- मां-बाप को मार दो। बता दूं कि एक साथी के पिता की मृत्यु हो गई थी और वो लंबी- शायद 15 दिन- की छुट्टी पर थे) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोएडा में घर में कैद दोनों बहनों में से एक की मौत हो गई.... तो समाज की चेतना पर सवाल उठाए गए..... संवेदनहीन होते जाने पर चिंता की गई..... सोनू सिन्हा को ट्रेन से फेंक दिया गया तो समाज को झकझोरने के लिए भाषण दिया गया.... मैं सोचता हूं कि अगर रोज़-रोज़ सरेआम ज़लील किए जाने से, बार-बार ख़ुद को नाकारा, मूर्ख बताए जाने से हम में से कोई अगर डिप्रेशन में आ गया.... अगर कोई घर-बार भूलकर यहीं, इसी ऑफिस में पड़ा रह गया.... भूखा-प्यासा जब तक हिम्मत रही दौड़ता रहा फिर गिर गया.... तो.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो महान संवेदनशील आदमी क्या करेगा.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो घिन करेगा- घृणित बातें बोलेगा और कहेगा कि इसे उठाकर बाहर फेंक दो- बदबू करने लगा है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-6344279243501723903?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/6344279243501723903/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=6344279243501723903&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/6344279243501723903'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/6344279243501723903'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='संवेदना अपनी-अपनी'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-8959181913461467121</id><published>2011-03-28T02:05:00.000-07:00</published><updated>2011-03-28T02:07:28.526-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आंखन देखी'/><title type='text'>एक बाबा की कहानी</title><content type='html'>बाबा को शौक़ था प्रवचन देने का... हालांकि वो प्रवचन देने वाला बाबा नहीं था.... वो एक मंदिर का मुख्य पुजारी बना था- हाल ही में। उसे मंदिर चलाते रहना था- बस यही करना था। इस मंदिर का धंधा जम चुका था। इसकी अपनी भक्त संख्या थी। इसमें दर्शन करने के लिए आने वाले भक्तों की संख्या करीब-करीब तय हो चुकी थी। इस मंदिर की ख़ासियत स्थानीय देवी-देवता थे, उनके प्रभाव का प्रचार था। स्थानीय लोग तो यहां आते ही थे- बाहर से आने वाले भी यहां मत्था टेकने ज़रूर आते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये मंदिर दरअसल तीन मंदिरों का समूह था..... अपने पापों को धोने के लिए या पैसे को ठिकाने लगाने के लिए एक बिज़नेसमैन ने इसकी स्थापना करवाई थी। एक दबंग किस्म के महंत को सेठ ने मंदिर बनवाने और जमाने का ठेका दिया था। महंत अपने काम में माहिर था। उसने ज़मीन खरीदी, दान में ली या कब्ज़ा ली... मतलब जो भी मंदिर के लिए ज़रूरी था किया। उसने मंदिर को सजाने वाले, पूजा और लंगर की व्यवस्था करने में कुशल, सुर में आरती गाने वाले और वक्त ज़रूरत जिज्ञासु भक्तों को स्थानीय देवताओं का महत्व बताने वाले पुजारी नियुक्त किए। इन सब पर वह ख़ुद नज़र रखता- धमकाता, पुचकारता, पिलाता-खिलाता, घुमाता यानि कि सबकी नकेल अपने हाथ में रखता.... महंत ने मंदिर जमा दिया.... एक से शुरू होकर तीन बड़े मंदिरों का समूह बना दिया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिरों से होने वाली कमाई और उनके प्रभाव (अधिकारी, नेता भी आखिर धर्मभीरू होते हैं) सेठ और महंत के रिश्तों में दरार डाल दी.... महंत अपनी ठसक के साथ उठकर चला गया....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेठ को धंधा समझ आ चुका था.... उसने मंदिर ट्रस्ट का एक प्रबंधक नियुक्त किया जो उसका सही मायनों में प्रतिनिधि था... उसे पूजा, भक्ति, प्रवचन से मतलब नहीं था.... वो तो बस चढ़ावे, दर्शन के दौरान व्यवस्था, पुजारियों के वेतन, कपड़ों वगैरा-वगैरा का ध्यान रखता था। हां वो प्रसाद, पूजा सामग्री की दुकानें भी खोल रहा था और उन्हें जमा रहा था..... सेठ ने धर्म को बेशर्मी से कैश करना शुरू कर दिया था....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महंत के जाने के बाद पुजारियों पर नियंत्रण के लिए सेठ को एक भगवाधारी की ज़रूरत थी। बाबा की किस्मत खुल गई.... इससे पहले बाबा कभी भी किसी मंदिर का मुखिया नहीं रहा था.... वो मंदिरों में साधारण पुजारी रहा था बस.... लेकिन उसे प्रवचन देने का बहुत शौक था। इससे पहले उसे प्रवचन देने का मौका नहीं मिला था, आखिर पुजारी की कौन सुनता है.... दरअसल वो पिछले मंदिर से बाहर ही इसी प्रवचनी आदत के चलते हुआ.... दरअसल उसे समझ ही नहीं आया कि प्रवचन देने वालों की कैटेगिरी अलग है.... वो आरती, पूजा नहीं करते.... अगर कर ली तो फिर प्रवचन की मार्केट नहीं बन पाती.... बहुत शौक है तो मंदिर प्रबंधन जब कहे तब थोड़ा बहुत बोल दो- बस.... आदत मत डालो वो ख़तरनाक है..... पर ये ख़तरनाक आदत बाबा को पड़ चुकी थी.... वो मंदिर को चलाने वाले और प्रवचन देने वाले दो अलग किरदारों के बीच झूल रहा था.... जो काम था उसे छोड़ नहीं सकता था और जो शौक है वो उसे छोड़ नहीं रहा था.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो शौक को मौका मिल गया और वो जिम्मेदारी पर हावी हो गया...  बाबा ऐसे प्रवचन देने लगा जैसे कि सस्ती कविताएं कहने वाला सबको पकड़-पकड़ कर कविताएं सुनाता है....सुबह की आरती हो न हो उसने पुजारियों को चर्चा के लिए आना ज़रूरी कर दिया.... हालांकि बहाना ये था कि हर मंदिर का हर दिन नया होता है.... कब कौन सा त्यौहार है, किस देवता का दिन है उसके हिसाब से आरती, प्रसाद, भक्तों की भीड़ के हिसाब से व्यवस्था पर बात की जानी चाहिए.... लेकिन बाबा का ध्यान पुजारियों को प्रवचन देने पर ही रहता.... उन्हें मंदिर की व्यवस्था, भक्ति और आरती के स्तर, प्रसाद की गुणवत्ता  से कोई मतलब नहीं रहता.... वो तो बस इस फ़िराक़ में रहते कि जो भी आज तक उन्होंने पढ़ा है- उसे दूसरों पर उड़ेल दें.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये पुजारियों को कुछ वक्त बाद समझ आया कि बाबा के सवालों का जवाब नहीं देना है... बस चुपचाप बैठे रहना है या खींसे निपोर कर कह देना है कि महाराज नहीं जानते..... तब बाबा पुजारियों की बुद्धि पर तरस खाते हुए जवाब देते.... हां अगर आपने जवाब दे दिया तो आपकी खैर नहीं.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे कि एक दिन हनुमान की आरती के संबंध में बात हो रही थी कि बाबा ने पूछा कि हनुमान जी की मां कौन थी....&lt;br /&gt;हनुमान मंदिर के पुजारी ने बता दिया- जी  अंजनी....&lt;br /&gt;बाबा ने थोड़े गुस्से से कहा नाम तो कोई भी गधा बता देगा.... मैंने पूछा कि मां कौन थी....&lt;br /&gt;जी वो वानरराज कुंजर की बेटी थीं.... उनका विवाह वानरराज केसरी के साथ हुआ था और गुमला से 21 किमी दूर आंजन पहाड़ की चोटी पर एक गुफ़ा में उन्होंने परमवीर हनुमान को जन्म दिया था.....&lt;br /&gt;जन्म दिया था... जन्म दिया था.... अरे जन्म दिया था तभी तो माता बनीं.... पता नहीं कहां से आ गए धर्म के क्षेत्र में....&lt;br /&gt;अरे कोई साधारण वानरी कैसे पवनसुत, महाबली, हनुमान को जन्म दे सकती है.... माता अंजनी पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में एक अप्सरा थीं.... उनका नाम था पुंजिकस्थला....  वो परम सुंदरी थीं और स्वभाव से चंचल थीं। इसी अतिचंचलता के चलते वह कई बार दूसरों को नाराज़ कर देती थीं.... एक बार पुंजिकस्थला ने तपस्या में लीन एक ऋषि के साथ अभद्रता कर दी। ऋषि की तपस्या भंग हो गई तो उन्होंने श्राप दे दिया कि वानरी की तरह स्वभाव करने वाली जा तू वानरी हो जा। पुंजिकस्थला को अपनी गलती का अहसास हो गया और वह ऋषि से क्षमा याचना करने लगी। ऋषि का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने कहा कि श्राप का प्रभाव तो टल नहीं सकता परंतु तुम्हारा वह रूप भी परम तेजस्वी होगा। तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक अमर हो जाएगा। अंजनी के रूप में जन्म लेकर पुंजिकस्थला ने चैत्र मास की शुक्ल पूर्णिमा को महावीर हनुमान को जन्म दिया।&lt;br /&gt;जी-जी महाराज... सही कहे आप कोई साधारण वानरी कैसे महाबली को जन्म देगी....&lt;br /&gt;देखा तुमने (बाबा ने सभी पुजारियों को कहा) ऋषि का क्रोध देख तुरंत अक्ल आ जाती है आज भी (फिर हंसे.... ताकि बाकी भी हंसें)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो बाबा ने शाम की आरती के बाद प्रवचन देने का नियम बना लिया.... इस प्रवचन में आस-पास के बूढ़े-बुजुर्ग, प्रसाद खाने के लिए लालायित गरीब बच्चे और मंदिर को लड़कियां देखने के लिए सबसे अच्छी जगह मानने वाले लंपट आने लगे...... बाबा उन्हें देख-देख कर ख़ुश होता और बाबा परमहंस जैसी मुद्रा में बैठता.... हालांकि अक्सर वो उन्हीं विषयों पर प्रवचन करता जो उस दिन के अख़बार में धर्म के पन्ने पर छप चुका होता.... पूरा दिन वह उस विषय पर नोट्स बनाने में लगा रहता.... इसके बाद भी शाम का प्रवचन किसी भी बेहद साधारण प्रवचन से बेहद ख़राब और बोरिंग होता.... दरअसल बाबा ये मान बैठा था कि उसके तेज से ही आरती और मंदिर के अन्य कार्यक्रम सफल होते हैं.... कमज़ोर और मजबूर पुजारियों, मुफ़्त का प्रसाद पाने वालों में इतनी हिम्मत थी नहीं कि वो बाबा को सच्चाई बताते.... बाकी मंदिर परिसर में दुकान करने वालों को बाबा से मतलब था नहीं.... वो बस भगवा देख उसे नमस्कार कर देते... बाबा सोचता कि ये सभी उसके भक्त हैं.... इस सबसे बाबा का दिमाग़ इतना ख़राब हो गया था कि वो शीशे में अपना प्रतिबिंब देखकर उसे भी आशीर्वाद देने लगता या फिर ऐसी बात पूछने लगता जो उसने अभी पढ़ी है.... फिर कहता कि चलो तुम्हें तो पता ही होगा तुमने अभी ही पढ़ा है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़ाहिर है बाबा का तेज सिर्फ उन्हीं को महसूस होता था.... बाकी उनसे ऐसे ही दूर भागते जैसे कि किसी बदबूदार जानवर से दूर भागते हैं.... बाबा को लगता कि ये मेरे तेज से घबरा रहे हैं.... वो ख़ुश होता- और जोर से प्रवचन करने लगता.... उसे लगता कि तेज बढ़ रहा है लेकिन दरअसल बढ़ रही थी बदबू....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा बात-बे-बात धर्मक्षेत्र का कोड़ा फटकारता..... अगर किसी पुजारी का पेट ख़राब हो गया और वो सुबह-शाम की चर्चा (यानि कि प्रवचन) में शामिल न हो पाए तो बाबा नाराज़ हो जाता- धर्म का काम करने का दावा करते हैं लेकिन पेट पर नियंत्रण तक नहीं रख सकते... घिन आती है...&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पुजारियों को भी घिन आती थी.... बदबू बढ़ती जा रही थी.... अब डर इस बात का था कि किसी दिन कोई कै न कर दे....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-8959181913461467121?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/8959181913461467121/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=8959181913461467121&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/8959181913461467121'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/8959181913461467121'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='एक बाबा की कहानी'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-4755481635156515626</id><published>2011-01-05T00:42:00.000-08:00</published><updated>2011-03-28T22:49:47.513-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आंखन देखी'/><title type='text'>फैसले का वक्त</title><content type='html'>मुश्किल है बहुत मुश्किल है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी पत्रकारिता में नई जगह काम मिल पाना बहुत-बहुत मुश्किल है (अंग्रेज़ी की मुझे जानकारी नहीं)। चाहे आप हमारी तरह चौदह-पंद्रह साल गुज़ार चुके हो या चौदह-पंद्रह महीने काम किया हो.... नई नौकरी पाना सबके लिए मुश्किल है।&lt;br /&gt;पिछले कुछ वक्त से तो स्थिति एकदम ख़राब हो गई है। किसी भी अख़बार, टीवी में देखें उसके मुख्य दरवाज़े पर कोई भारी-भरकम शख्सियत अपनी शख्सियत से भी भारी चूतड़ लेकर बैठी है। इस हकीकत को स्वीकार करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था कि कहीं भी एंट्री आप चूतड़ में घुसे बिना नहीं पा सकते..... मुख्य दरवाज़े तक पहुंचने के लिए जो छोटे रास्ते हैं... उसमें बड़ी शख्सियत के चूतड़ में घुसने वाले अपनी छोटे चूतड़ लेकर बैठे हैं.... छोटे में घुसोगे तो बड़े तक पहुंचोगे.... और फिर उसमें घुसकर ही काम की जगह निकल सकते हो....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अख़बार हो या टीवी... हर जगह स्थिति कमोबेश एक सी नज़र आती है.... आप अख़बारों के- टीवी के नाम गिनते जाओ आपको मुख्य दरवाज़े पर बैठे बड़े चूतड़ का नाम दिख जाएगा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे सच ये है कि उस सबसे बड़े चूतड़ वाली शख्सियत के मुंह पर कोई लाला पाद रहा है......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप अब भी चाहो तो ये भ्रम कायम रख सकते हो कि पत्रकारिता की कोई जगह बची है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो..... क्या वक्त आ गया है.... पत्रकारिता नाम की चीज़ का भ्रम पाले रहें, गाड़ी पर प्रेस लिखने से मिलने वाली सुविधा के लिए चूतियापा करते&lt;br /&gt;रहें, घर चलाने के लिए धोखे की नौकरी करते रहें....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या विकल्प तलाशें, जिसमें जीवन गुज़ारने लायक पैसा हो और झूठ न बेचना पड़े&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-4755481635156515626?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/4755481635156515626/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=4755481635156515626&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/4755481635156515626'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/4755481635156515626'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='फैसले का वक्त'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-6735140826806860825</id><published>2010-12-31T02:00:00.000-08:00</published><updated>2011-03-28T02:02:18.993-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आंखन देखी'/><title type='text'>एक डाकू की कहानी</title><content type='html'>डाकू फाड़ू दुर्दांत आजकल बड़ी उहापोह में है.... फ़ैसले की घड़ी आ गई है.... अब उसे तय करना है कि शांति की ज़िंदगी ही गुज़ारे या रिटायरमेंट छोड़कर वापस जंगल लौट जाए.... &lt;br /&gt;दिमाग कहता है कि अब बस उम्र हो गई है- आराम करो.... लेकिन दिल है कि मानता नहीं.... वो हो-हल्ले की ज़िंदगी, वो मारकाट, वो अपने ही डकैतों को आपस में लड़वाने का खेल और वो हसीनाएं..... आsssह सब बहुत याद आते हैं.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिन नहीं हुए फादु को अपनी जंगल की दुनिया छोड़े.... अपने इलाके में वो ख़ौफ़ का दूसरा नाम था.... हालांकि अब सरकार से उसकी पटरी नहीं बैठ रही थी और वो इलाका छोड़ना उसकी मजबूरी हो गया था.... लेकिन क्या हुआ.... पहले भी ऐसा हो चुका है.... वो पहले भी अपने बनाए साम्राज्य से बाहर किया गया है.... लेकिन अपने बाजुओं की ताकत और अपने शातिर दिमाग से उसने फिर नया साम्राज्य बना लिया - फिर नया जंगल बसा लिया.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत हरामी, बहुत ऐय्याश, बहुत क्रूर..... अपने स्वभाव के जैसे डकैत उसके आस-पास हमेशा रहते थे.... लेकिन फादु ने कभी किसी पर पूरा भरोसा नहीं किया.... लोग तो कहते कि वो अपने दिल की बात सपने में भी खुद से नहीं बोलता था.... यही रहस्यमयी बर्ताव उसका रौब और ख़ौफ़ दोनों बना कर रखते..... उसके सबसे प्रिय डाकू को भी डर रहता कि फादु कहीं उसकी ही न फाड़ दे- बेबात के.... फादु को इसमें मज़ा आता.... अपने बनाए जंगल में जब वो चिल्लाता तो बड़ी-बड़ी रामलीलाओं के भयंकर से भयंकर रावण भी बच्चे नज़र आते..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब थोड़ी-थोड़ी थकान होने लगी है.... शरीर भी आखिर कब तक साथ देगा.... फिर शरीर भी ऐसा जिसका आपने पचास साल से भी ज़्यादा जानवरों की तरह शोषण किया हो.... दारूखोरी, औरतखोरी और हाथापाई में..... कभी-कभी तो ऐसा लगता कि दिमाग भी थकने लगा है.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए इस बार... इस बार उसने सोचा कि बस अब आराम करने का वक्त आ गया है.... ऐसा नहीं कि उसे किसी दूसरे इलाके से, किसी और नेता ने अपने यहां आ बसने का न्यौता नहीं दिया.... फादु की ख्याति दूर-दूर तक है.... लोगों का चाहे जो हो- सरकारों के लिए वो हमेशा फ़ायदे का सौदा रहा..... फिर भी ये साली सरकारें ये नेता उसका इस्तेमाल करने के बाद उसे दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं.... हाssssssह.... फादु गुर्राया.... साला जंगलराज.... जिस काम का वो एक्सपर्ट है (दूसरों को इस्तेमाल कर निकाल फेंकने का) उसी का वो भी शिकार होता रहा है..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस अब और नहीं.... विरक्ति हो गई फादु को इस दुनिया से, इस जंगल से &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो बस इससे दूर जाना है- फादु ने सोचा.... लेकिन फाड़ू दुर्दांत रिटायर भी होगा तो स्टाइल के साथ.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फादु ने रिटायरमेंट का पक्का इंतज़ाम कर लिया..... एक पुराने नेता को... जिसे वो बीच-बीच में उपकृत करता रहा है..... उसने इस बार के जंगलराज में पूरी तरह सैट किया..... उसके इलाके में जाल बिछाया.... उसे घेरे में लिया और फिर एक दिन- जब सारे डकैत किसी नए इलाके को जंगल बनाने की तैयारी कर रहे थे... फादु ने समर्पण कर दिया..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फाड़ू दुर्दांत ने समर्पण कर दिया.... ये ख़बर जंगल में आग तरह फैली और सभी डकैत इससे झुलस गए.... किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी.... सब अपनी जान बचाने के नुस्खे जुगाड़ने लगे.... फादु की जगह जो नया सरदार बना था- उसे साफ़ करने का इरादे त्याग दिए गए.... पुराने बागी वफ़दार हो गए और नए सरदार की बंदूक साफ़ करने लगे.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्दांत डाकू फाड़ू का समर्पण पूरी शान-ओ-शौकत के साथ हुआ.... उसकी उम्र, उसकी काबिलियत और सबसे बढ़कर नेता के प्रभाव को देखते हुए..... फादु को खुली जेल में रखा गया... उसे घूमने-फिरने, बात करने, मेहमानों से मिलने-जुलने की पूरी आजादी थी... शांति की ज़िंदगी... जैसे किसी रिटायर सरकारी अधिकारी की हो.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शांति जेल जैसी है- खीजकर कहता फादु.... गुर्राने की आदत जा नहीं रही... साली कुचलने की ताकत के बिना तो ये कुछ ही दिन में मज़ाक बन जाएगी.... ज़्यादा दिन ऐसे ही रहा तो पादू कहलाने लगूंगा.... साला यहां तो ऐसे-ऐसे लोगों की सुननी पड़ रही है कि मन करता है कि गर्दन मरोड़ दूं.... ऐसी रिटायरमेंट से तो मौत अच्छी.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछ वक्त से फादु सोच रहा था कि जल्दी में ले लिया रिटायरमेंट.... अपना उत्तराधिकारी भी नहीं बना पाया ठीक से... हां साले सब नालायक ही निकले.... कोई वफ़ादार है तो काम का नहीं... जो काम का निकला वो वफ़ादार नहीं.... साले चूतिये हैं सब.... &lt;br /&gt;हां ये नया लड़का है तेज.... अपनी ही जाति का भी है.... शातिर, क्रूर, षड्यंत्रकारी- गुण सारे हैं दुर्दांत बनने के..... बस थोड़ा जल्दबाज़ है.... तो क्या मैं भी तो था..... फादु को अपने नए सेनापति में अपना अक्स दिखता था कभी-कभी.... सोचता था कि इसे ही सेनापति नियुक्त कर जाऊंगा.... लेकिन जंगल से इतनी जल्दी भागना पड़ा कि तैयारी का वक्त ही नहीं मिला.... रिटायरमेंट की योजना पर जल्दी ही अमल करना पड़ा..... ग़लती हो गई साली.... पीछे कोई तो ऐसा हो कि जंगल में जाने पर राजा का सा स्वागत हो.... वरना तो भूल ही जाएंगे सब.... दुनिया ही ऐसी है..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो..... &lt;br /&gt;ग़लती सुधारने का वक्त है.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेता चिढ़ेगा- तो क्या.... चिढ़ने दो साले को.... जबसे जेल में आया हूं उसके भी भाव बदल गए हैं.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया हंसेगी... कि फादु सठिया गया है - तो क्या.... हंसने दो ऐसा आतंक मचाऊंगा कि हंसने वालों के होंट फट जाएंगे- दांत गिर जाएंगे.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाssssssह.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फादु ने ऐलान कर दिया...... मैं वापस आ रहा हूं..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डकैत एक बार फिर से उत्साह में आने लगे..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार फादु काम पूरा निपटा कर ही लौटेगा..... उत्तराधिकारी को स्थापित करके आएगा- आखिरी दुर्दांत...... और फिर पक्की रिटारयरमेंट.... लेकिन पहले तो कत्लेआम मचाना है..... चलो थोड़ी गुर्राने की, चिल्लाने की और हां पार्टीबाज़ी की भी तैयारी कर ली जाए....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-6735140826806860825?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/6735140826806860825/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=6735140826806860825&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/6735140826806860825'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/6735140826806860825'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='एक डाकू की कहानी'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-193541761602879645</id><published>2010-10-23T05:19:00.000-07:00</published><updated>2010-10-23T05:38:18.273-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्तों के नाम'/><title type='text'>आधुनिक नचिकेता</title><content type='html'>प्रतियोगिता दिनोंदिन बढ़ रही थी और इसी के चलते अपने अख़बार का प्रसार बढ़ाने के लिए यमराज के दौरे भी। ऐसे ही एक दौरे से लौटने के बाद उन्हें पता चला कि एक युवक पिछले तीन दिन से उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। बायो-डाटा देखते ही यम ने उसे बुलवा भेजा। ये देखकर कि शहर के सबसे सस्ते ढाबे और सबसे सस्ते होटल ने तीन दिन में ही उसकी हालत ख़स्ता कर दी है वह बेहद प्रसन्न हुए। प्रथम श्रेणी के छात्र और बेहद संभावनापूर्ण लेखक की मजबूरी को ताड़ते ही उनके मुंह में पानी आ गया। मुख पर गंभीरता ओढ़ इस पर बेहद दुख व्यक्त किया कि उसे तीन दिन इंतज़ार करना पड़ा। सख़्त ज़रूरत होते हुए भी कहा कि नौकरियों का बेहद टोटा है। उसकी निराशा और मजबूरी को बढ़ता देख आखिर यम ने उसकी इच्छा पूरी कर दी... उसे नौकरी दे दी और अपने अख़बार में अनंतकाल के लिए एक और प्रशिक्षु रख लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(सुधीर राघव के लिए पंजाब केसरी (98-99) के दिनों में लिखी गई)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-193541761602879645?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/193541761602879645/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=193541761602879645&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/193541761602879645'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/193541761602879645'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html' title='आधुनिक नचिकेता'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-6757377550539819282</id><published>2010-10-14T09:00:00.000-07:00</published><updated>2010-10-14T09:04:35.347-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्तों के नाम'/><title type='text'>तहखाना (दो पीस)</title><content type='html'>&lt;strong&gt;वॉल्व &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;टांय और ठांय के बीच &lt;br /&gt;फंसी हुई पत्रकारिता &lt;br /&gt;बंदूक से निकले &lt;br /&gt;तो दांतों में अटके &lt;br /&gt;तहखाने में दो दरवाज़े हैं अब &lt;br /&gt;दोनों अपने किस्म के &lt;br /&gt;डेंज़र वॉल्व के साथ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;=================================&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पत्रकारिता और हिसाब &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इसका मतलब वह नहीं &lt;br /&gt;जो आप समझ रहे हैं &lt;br /&gt;इसका मरने वालों, &lt;br /&gt;हताहतों &lt;br /&gt;पेट्रोल पंप पाने वालों &lt;br /&gt;या इसी किस्म के &lt;br /&gt;किसी भी आंकड़े से &lt;br /&gt;कोई वास्ता नहीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह हिसाब प्रमोद कौंसवाल का है &lt;br /&gt;ख़बर की बाइट गिनने &lt;br /&gt;हेडिंग के शब्द गिनने का हिसाब &lt;br /&gt;तहखाने के नए बाशिंदे की &lt;br /&gt;अपनी पत्रकारिता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अमर उजाला (99-03) के दिनों में लिखी गई)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-6757377550539819282?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/6757377550539819282/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=6757377550539819282&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/6757377550539819282'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/6757377550539819282'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2010/10/blog-post_14.html' title='तहखाना (दो पीस)'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-2131710068770731312</id><published>2010-10-11T06:53:00.000-07:00</published><updated>2010-10-11T06:58:11.802-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्तों के नाम'/><title type='text'>तहखाना</title><content type='html'>सिर्फ नए खून को निमंत्रण है यहां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो तहखाने के कानूनों के खिलाफ बगावत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं करता, नहीं कर सकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथ नहीं उठाता, नहीं उठा सकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए हां केवल इसलिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नए खून को निमंत्रण हैं यहां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलते हुए खून की गंध और स्वाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे बूढ़े आदमखोर को बेहद पसंद है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अमर उजाला में अजय शर्मा ने ये कमाल का पीस लिखा था। आश्चर्य की बात ये है कि उसे ख़ुद भी याद नहीं कि ये उसने लिखा था। तहखाना में कुल चार पीस थे- ये मुझे याद रहा, रघुवीर सहाय की रामदास की तरह।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-2131710068770731312?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/2131710068770731312/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=2131710068770731312&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2131710068770731312'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2131710068770731312'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2010/10/blog-post_11.html' title='तहखाना'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-7948055232183986387</id><published>2010-10-06T07:48:00.000-07:00</published><updated>2010-10-06T08:00:49.048-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>मज़दूर मक्खी</title><content type='html'>हर रोज़ ऐसे कुछ लम्हे आते थे.... जब हम साइडलाइन्ड महसूस करते..... या गधों की तरह काम करते हुए देखते कि काम न करने वाले बॉस के आस-पास चहक रहे हैं जबकि यहां मूतने की फ़ुर्सत नहीं है..... &lt;br /&gt;ऐसे ही एक लम्हे में उसने पूछा कि क्या यार..... हम ऐसे ही रह जाएंगे.... क्या हमारी ही तरक्की नहीं होगी.... बाकी चूतियों को देखो- कहां के कहां पहुंच गए. बोलो- क्या हमारी हालत कभी सुधरेगी भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज़ के विपरीत आज मैंने गाली नहीं दी.... रोज़ के विपरीत मैंने उसे सांत्वना नहीं दी.... रोज़ के विपरीत मैं आज मैं बोला- ऐसे कि जैसे मुझे बोधिसत्व प्राप्त हो गया है.... &lt;br /&gt;हां शायद हम ऐसे ही रह जाएंगे हमेशा..... जैसा कि मधुमक्खियों की दुनिया में होता है- मज़दूर मक्खी मज़दूरी ही करती है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब, उसने पूछा &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;देखो भाई- मधुमक्खियों का छत्ता एक पूरी दुनिया होता है. इसमें सिर्फ़ खाने वाले भी होते हैं और सिर्फ़ काम करने वाले भी. इसमें घर भी होते हैं. स्टोर रूम भी. राजमहल भी और मज़दूरों के घर भी. तो ज़रूर इसमें मीडिया हाउस भी होते होंगे-- अख़बार और टीवी भी होते होंगे. उनमें चैनल हेड होते होंगे और पैकेज प्रोड्यूसर होते होंगे. पत्रकारों को डंप करने के लिए इंजस्ट और व्हील जैसे तहखाने भी होते होंगे। लेकिन हमारी दुनिया की तरह उनमें कुछ नहीं होता होगा तो वो होगा असंतोष.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये इसलिए कि मधुमक्खियों की दुनिया में चीज़ें साफ़ हैं. रानी मक्खी का काम है- प्रजनन करना और सेवा करवाना. तो मज़दूर मक्खी का काम है सेवा करना. इसमें सब तरह की सेवा शामिल है। नर मक्खी रानी के साथ मिलन करती है और मर जाती है-बिना किसी शिकायत के। यानि कि जिसके हिस्से जो काम आता है वो वही करता है. किसी को असंतोष नहीं, शिकायत नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो मेरे दोस्त अगर आपको अपनी भूमिका पता हो तो कोई दिक्कत नहीं होगी. अगर आप पिछले पांच, दस, पंद्रह साल से मज़दूरी कर रहे हैं तो ज़रूर मज़दूर मक्खी ही होंगे। अपनी भूमिका ईमानदारी से निबाह लें वही बहुत है। जो रिपोर्टर मक्खी होते हैं वो इंजस्ट से भी रिपोर्टिंग में चले जाते हैं. प्रोड्यूसर मक्खी कुछ भी करके प्रोड्यूसरत्व को प्राप्त हो ही जाते हैं. और मज़दूर मक्खी को अगर प्रोड्यूसर बना भी दिया जाए तो वो वहां भी मज़दूरी ही करता है. इसी तरह प्रोड्यूसर मक्खी पैकेजिंग में भी प्रोड्यूसरी करती दिखेगी। अर्थात मज़दूर मक्खी कई साल के अनुभव और न्यूज़ सेंस के बाद भी पैकेज प्रोड्यूसर ही बनी रहेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसी मक्खियां भी हैं जो सिर्फ़ भिनभिना कर अपनी अहमियत बनाए रख सकती हैं. ये रानी मक्खी के आगे भिनभिनाती हैं फिर मज़दूर मक्खियों के आगे भिनभिनाती हैं और इतना भिनभिनाती हैं कि रानी और मज़दूर को एक-दूसरे की बात सुनाई नहीं देती. फिर ये दोनों को अलग-अलग कहानियां सुनाकर अपनी जगह बनाती और पक्की करती रहती हैं..... &lt;br /&gt;ऐसी मक्खियां अपने आस-पास तो बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं.... मधुमक्खियों की दुनिया में होती हैं या नहीं, इसका अभी पता नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो बात साफ़ है कि अगर आपको अपनी स्थिति और भूमिका का पता हो तो फिर ऐसे सवाल बेमानी हो जाते हैं कि क्या हमारी स्थिति हमेशा ऐसी ही रहेगी. एक मज़दूर मक्खी जैसी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(सहारा के दिनों में लिखी थी.... अब भी अपनी ही बात सही लगती है)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-7948055232183986387?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/7948055232183986387/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=7948055232183986387&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/7948055232183986387'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/7948055232183986387'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2010/10/blog-post_06.html' title='मज़दूर मक्खी'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-3013569119860156766</id><published>2010-10-01T07:56:00.000-07:00</published><updated>2010-10-01T08:00:27.378-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>मैं बॉस नहीं</title><content type='html'>बॉसत्व एक भाव है.... स्थिति नहीं, पद नहीं.... भाव। कुछ लोग इसी भाव के साथ पैदा होते हैं (प्रोफेशन में)..... कुछ लोग उम्र गुज़ारने के बाद भी- पद पाने के बाद भी इस भाव को प्राप्त नहीं हो पाते.... कुछ जो ज़्यादा स्मार्ट होते हैं, मौका मिलते ही भाव को प्राप्त हो जाते हैं.... लेकिन ऐसे विरले ही होंगे जो पद न रहने पर इस भाव से मुक्ति पा जाएं..... &lt;br /&gt;पहले भी सोचता रहा हूं- पिछले कुछ वक्त से ज़्यादा साफ़ दिख रहा है कि - अपन बॉस मटीरियल नहीं हैं। बॉसत्व प्राप्त लोगों से अपनी कभी अच्छी पटी भी नहीं.... कुछ मित्र भी बॉसत्व को प्राप्त हो गए हैं लेकिन वो तभी तक मित्र हैं जब तक उनके साथ काम न करना पड़े (एक के साथ करना पड़ा तो अब वो मित्र नहीं है)। &lt;br /&gt;वैसे बॉसत्व की एक स्थिति को मैं भी प्राप्त हो गया हूं (करीब साल भर से) लेकिन भाव को प्राप्त नहीं हो पाया। अब भी मैं एक टीम लीडर ही हूं। वही टीम लीडर जो अमर उजाला में था (चाहे टीम दो-तीन आदमियों की क्यों न हो)। निश्चित काम, काम की निश्चित शर्तें और उसे डिलीवर करने का निश्चित समय। इन चीज़ों के साथ अपन ठीक  रहे..... थोड़ी-बहुत जॉब सेटिस्फेक्शन भी मिलती रही। लेकिन बॉस के मन को पढ़ लेने की कला में अपन हमेशा ही पिछड़े रहे.... इसलिए करियर में भी पिछड़े ही रहे। &lt;br /&gt;ये बात अब पुरानी हो गई है कि जिन्हें हम चूतिया कहते थे (काम के लिहाज से) वो आगे बढ़ते रहे..... अब वो इतने आगे बढ़ चुके हैं कि उन्हें चूतिया कहना दरअसल खुद बनना है। पहले तो समझ नहीं आता था अब साफ़ दिखता है.... काम करने वाला हमेशा काम ही करता रहेगा और तरक्की करने वाला तरक्की का रास्ता ढूंढ ही लेगा। &lt;br /&gt;अभी कुछ वक्त पहले एक ने पूछा- &lt;br /&gt;कहां हो &lt;br /&gt;यहीं &lt;br /&gt;मतलब काम कहां कर रहे हो &lt;br /&gt;काम या नौकरी &lt;br /&gt;मतलब &lt;br /&gt;मतलब काम क्या और नौकरी कहां &lt;br /&gt;अच्छा नौकरी कहां कर रहे हो &lt;br /&gt;साधना न्यूज़ नोएडा &lt;br /&gt;(मुझे पता था वो कहां है) तुम क्या कर रहे हो &lt;br /&gt;वही जो हमेशा करते थे &lt;br /&gt;मतलब- बकलोली &lt;br /&gt;वो बुरा मान गया&lt;br /&gt;लेकिन वो बॉस हो ही नहीं सकता जिसे बकलोली न आती हो..... बॉस से दबना और जूनियर्स को दबाना...  ख़बर या अफ़वाह सही आदमी तक पहुंचाना.... बॉस के मूड के हिसाब से काम करना और सही वक्त पर सही आदमी चुनकर उसके लटक जाना..... इसके अलावा तरक्की का क्या कोई और नुस्खा है ? &lt;br /&gt;अगर जानते हो तो मुझे भी बताना&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-3013569119860156766?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/3013569119860156766/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=3013569119860156766&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/3013569119860156766'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/3013569119860156766'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='मैं बॉस नहीं'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-7428256423783310937</id><published>2010-05-24T12:34:00.000-07:00</published><updated>2010-05-24T15:14:22.877-07:00</updated><title type='text'>मेरी जिनी</title><content type='html'>बचपन से मैं सोचता रहा हूं (मतलब जबसे मैंने अपने बारे में सोचना शुरू किया होगा) कि क्या मैं सुंदर हूं (शायद सभी खुद से ये पूछते हों)....  लेकिन कभी भी मैं खुद को भी आत्मविश्वास से, शीशे में देखकर, ये नहीं कह पाया कि-- हां तू खूबसूरत है.... हमेशा वही कमज़ोर सा, टाइमपास, जवाब निकलता रहा... ठीक तो हूं, उतना भी खराब नहीं हूं..... लेकिन अब.... अब शायद स्थिति कुछ बदल रही है.... लोग कहते हैं (मतलब मेरी दीदियां और भी कुछ लोग) कि मेरी बेटी की शक्ल मुझसे मिलती है..... तो उसे देखकर मैं सोचता हूं कि अगर मैं ऐसा रहा होउंगा तो यकीनन मैं प्यारा रहा होउंगा..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_r5ivpD5hI/AAAAAAAAAHM/ZFI9xDlUgho/s1600/100_2493.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_r5ivpD5hI/AAAAAAAAAHM/ZFI9xDlUgho/s400/100_2493.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5474962672321816082" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_r5AXCt5YI/AAAAAAAAAHE/g-XBKhtVEmc/s1600/100_2841.JPG"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_r5AXCt5YI/AAAAAAAAAHE/g-XBKhtVEmc/s400/100_2841.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5474962081602987394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_r4TCzd-4I/AAAAAAAAAG8/k4EKUTGxqMQ/s1600/100_2850.JPG"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_r4TCzd-4I/AAAAAAAAAG8/k4EKUTGxqMQ/s400/100_2850.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5474961303076207490" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_rXeSlIL4I/AAAAAAAAAG0/ii9gJu5TYKg/s1600/driving+licence+rajesh+115.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_rXeSlIL4I/AAAAAAAAAG0/ii9gJu5TYKg/s400/driving+licence+rajesh+115.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5474925212405870466" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-7428256423783310937?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/7428256423783310937/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=7428256423783310937&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/7428256423783310937'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/7428256423783310937'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='मेरी जिनी'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/S_r5ivpD5hI/AAAAAAAAAHM/ZFI9xDlUgho/s72-c/100_2493.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-6010557747114155003</id><published>2010-01-17T03:32:00.000-08:00</published><updated>2010-01-18T11:39:15.775-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी जादू की पुड़िया'/><title type='text'>बेटी तू किस पर हंस रही है</title><content type='html'>पिछले कुछ वक्त से (करीब डेढ़ महीने से) मैं अपनी बेटी को ग़ौर से देख रहा हूं..... (वैसे सभी अपने बच्चों को गौर से देखते होंगे) मेरी तीन बड़ी बहनों के छे बच्चे हैं (जैसे की सरकारी नीति है- बच्चे दो ही अच्छे).... यानि कि मैंने करीब-करीब घर में छे बच्चों को बड़ा होते देखा है..... दो-एक दोस्तों को छोड़कर सभी मुझसे बहुत पहले बाप बन चुके थे..... उनके बच्चों के साथ भी खेलता-खिलाता रहा हूं.... लेकिन कभी इतना छोटे बच्चे को नहीं खिलाया.... मुझे लगता है कि हममें से ज़्यादातर लोगों ने अपने बच्चों के अलावा इतने छोटे बच्चे को कम ही खिलाया होगा..... तो इस के साथ ही मुझे ये भी अहसास हुआ कि इतने छोटे बच्चे मां-बाप के ही होते हैं (दरअसल मां के) जब वो सिर्फ़ खाना, निकालना और सोना करते हों तो कोई उनके साथ क्या खेलेगा.... दादा-दादी, नाना-नानी जो भी उन्हें संभाल सके उसके भी होते हैं (नहीं लिखूंगो तो पापा बुरा मान सकते हैं) &lt;br /&gt;शायद इसीलिए कहते हैं कि मां-बाप बने बिना, इसकी ख़ुशी और दिक्कतें समझ नहीं आतीं। &lt;br /&gt;बहरहाल पिछले कुछ दिन से मैं ये भी समझने की कोशिश कर रहा हूं कि बच्चे हंसते-रोते क्यों हैं..... पिछले कुछ दिनों से तो जिनी मेरी कई तरह की आवाज़ों और शक्लों पर थोड़ा रिस्पांस भी करने लगी है लेकिन पहले भी वो हंसती थी-रोती थी-डरती थी..... नींद में भी और आंखें खोल कर भी.... उसका हमसे या उसके आस-पास की परिस्थितियों से सीधा कोई लेना-देना नहीं होता था..... &lt;br /&gt;मैंने मम्मी-पापा से पूछा- तो उन्होंने कहा कि बेमाता हंसाती-रुलाती है। &lt;br /&gt;मेरी दीदी का कहना था कि बच्चे को दूध के सपने आते हैं.... मिल रहा है तो ख़ुश, नहीं तो परेशान। हो सकता है- लेकिन जो कुछ दिन का बच्चा अपनी मां को ही नहीं पहचान पाता, वो दूध मिलने या छिनने के साफ़ चित्र कैसे देख-समझ पाता होगा। &lt;br /&gt;बहरहाल और भी कुछ मत होंगे लेकिन पहले मैं अपना मत रख दूं..... मुझे लगता है कि बच्चों का हंसना, रोना, डरना, शांत होना पेट पर निर्भर करता है। पूरी तरह पेट में चल रहे कैमिकल रिएक्शन पर.... वैसे तो बड़ों का मूड भी पेट पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है लेकिन जब तक बच्चा दूसरी चीज़ें (पलटना, बैठना, घुटनों के बल चलना) नहीं सीख लेता तब तक सब कुछ पेट पर ही निर्भर करता होगा- सब कुछ&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-6010557747114155003?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/6010557747114155003/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=6010557747114155003&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/6010557747114155003'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/6010557747114155003'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='बेटी तू किस पर हंस रही है'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-1464415757435130323</id><published>2009-06-28T07:33:00.000-07:00</published><updated>2009-07-01T02:45:15.376-07:00</updated><title type='text'>अलविदा जैक्सन</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SkeAC-WPCRI/AAAAAAAAAGM/87vfVpsLvug/s1600-h/mail.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 226px; height: 152px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SkeAC-WPCRI/AAAAAAAAAGM/87vfVpsLvug/s320/mail.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352387470737475858" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;माइकल जैक्सन के करोड़ों फ़ैन्स में से एक मैं भी हूं। जैक्सन की मौत की चाहे जो वजह सामने आए, मुझे लगता है कि वो कमोबेश ऐसी ही होनी थी...... म्यूज़िक और पर्फ़ार्मेंस की विपरीत उसने अपने शरीर, अपनी ज़िंदगी के साथ जो एक्सपैरिमेंट्स किए मुझे नहीं लगता कि वो सफल हुए.... वो एक परेशान आदमी था- एक बेहद कन्फ़्यूज़्ड शख़्सियत और दिनोंदिन ख़राब होती जा रही शारीरिक मानसिक स्थिति के साथ वो इसी तरह के अंत की दिशा में बढ़ रहा था..... &lt;br /&gt;पिछले शनिवार (20-06-09) को ही मैं अपने भांजों के साथ जैक्सन के गानों की डीवीडी देख रहा था....जब भी मैं जैक्सन की पुरानी तस्वीरों को देखता हूं, पुराने वीडियो देखता हूं तो मुझे एक काला, ख़ूबसूरत और सहज लड़का दिखता है..... `थ्रिलर’ तक उसकी मुस्कान बेहद प्यारी दिखती है.... वो बहुत ख़ूबसूरत, बहुत प्यारा दिखता है। लेकिन `बैड’ में मुझे उसमें ग्रहण लगता दिखता है..... जैक्सन ने अपनी चमड़ी का रंग तो बदल लिया लेकिन हर बार प्लास्टिक सर्जरी के साथ उसके अंदर का सहज आदमी मरता गया..... बंबई में उसके कन्सर्ट के दौरान दिख रहा था कि उसका हाथ भारतीयों के हाथों से गोरा था..... हो सकता है ये देख कर वो ख़ुश होता हो ? &lt;br /&gt;`डेंजरस’ के गानों के वीडियो में मुझे लगता है कि वो अपना पूरा बदन दिखाना चाहता है.... पूरा गोरा बदन..... `यू आर नॉट अलोन’ गाने में उसने करीब-करीब अपना पूरा शरीर दिखाया है- प्लास्टिक सर्जरी का चमत्कार। &lt;br /&gt;`थ्रिलर’ की रिकॉर्डतोड़ बिक्री के बाद भी, दुनिया भर के लोगों को प्यार मिलने के बाद भी जैक्सन को अपना काला रंग बदलने की सूझी तो क्यों..... क्या उस दबाव को, क्या उस मानसिकता को समझना आसान होगा- जो उस पर रहा होगा..... मुझे ऐसा कोई प्रसंग सुनने-पढ़ने को नहीं मिला कि कैशियस क्ले की तरह उसे स्टार होने के बाद भी रंगभेद का शिकार होना पड़ा.... लेकिन पूरी उम्र वो काला होने के दबाव को झेलता रहा और अपने रंग को स्वीकार न कर पाने की वजह से ही उसने आखिर जान गंवा दी...... मुझे यकीन है कि माइकल जैक्सन की मौत की वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ रंगभेद है..... ऐसी हकीकत जिससे ये महान कलाकार तारतम्य नहीं बैठा पाया..... &lt;br /&gt;जैस्कन के बारे में सोचता हूं तो मुझे छोटे-छोटे सीन दिखते हैं- &lt;br /&gt;जैक्सन शीशे के आगे खड़ा होकर अपना बदन निहार रहा है.... एक गोरा आदमी। कभी वो ख़ुश होता है, कभी लगता है कि नहीं साला गोरा तो नहीं हो पा रहा..... और फिर अगली सर्जरी की तैयारी- इस बार थोड़ी लालिमा भी चाहिए। &lt;br /&gt;जैक्सन अपनी पुरानी तस्वीरों को देखता है..... प्यारी, ख़ूबसूरत, सहज मुस्कान.... देखकर वो सहज ही मुस्कुराने की कोशिश करता है.... लेकिन होंठ अटक जाते हैं। अब वो वैसे नहीं फैल सकते। उसकी मुस्कान बंधी हुई है, गु़लाम है शरीर के नए कानून की।  &lt;br /&gt;जैस्कन की नई गोरी चमड़ी में दिक्कत पैदा होने लगी है.... वो खिंचती है, उसमें दाने हो रहे हैं, स्पर्श का अहसास कम होता जा रहा है..... वो डॉक्टरों को फ़ोन करता है.... घबराता है.... रोता है.... रोते-रोते सो जाना चाहता है, लेकिन नींद नहीं आती.... वो कमरे में लगे अपने थ्रिलर के पोस्टर को देखता है..... शायद वो वेयरवोल्फ़ बन जाता तो बेहतर होता..... &lt;br /&gt;जैक्सन के घर उसके भाई और उनके बच्चे आए हैं..... सब जैक्सन को चाहते हैं- वो भी उन्हें चाहता है..... उनमें से कई में उसे अपना बचपन दिखता है...... सब साथ खेलते हैं, बातें करते हैं, गाने गाते हैं..... लेकिन लगातार उसे महसूस होता रहा है कि वो इन लोगों में से नहीं है..... उसे ये भी अहसास होता रहता है कि ये बात बाकी सभी को भी महसूस हो रही है...... अचानक उसका मूड ख़राब हो जाता है और वो अपने कमरे में जाकर कैद हो जाता है..... &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मुझे माइकल के वर्ल्ड टूर के वक्त के वीडियो याद आते हैं..... लड़कियां, लड़के माइकल आई लव यू चिल्लाते दिखते हैं.... वो भी पलट कर कहता है आई लव यू और कई लड़कियां बेहोश हो जाती हैं..... मैं कभी इमोशनल तो नहीं रहा लेकिन हां ये कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि-- माइकल आई लव यू &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- &lt;br /&gt;dRajesh&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-1464415757435130323?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/1464415757435130323/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=1464415757435130323&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1464415757435130323'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1464415757435130323'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='अलविदा जैक्सन'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SkeAC-WPCRI/AAAAAAAAAGM/87vfVpsLvug/s72-c/mail.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-2492180921261798189</id><published>2009-01-05T09:29:00.000-08:00</published><updated>2009-01-05T18:01:55.300-08:00</updated><title type='text'>स्टाइलशीटिया</title><content type='html'>पाश क्या तुम्हें पता है की दुनिया बदल रही है?&lt;br /&gt;क्या तुम जानते हो पत्रकारिता के इस जगत में&lt;br /&gt;सबसे खतरनाक क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे खतरनाक है...&lt;br /&gt;न जानना ख़बर को बस करसर घुमाना&lt;br /&gt;आना और मशीन की तरह जुट जाना&lt;br /&gt;सही-ग़लत भूल, वर्तनी दोहराना&lt;br /&gt;फुट्टे से नाप कर&lt;br /&gt;सिंगल, डीसी बनाना&lt;br /&gt;ख़ुद कुछ न आए, दूसरों को सिखाना&lt;br /&gt;न बोलना, न सोचना, बस आदेश बजाना&lt;br /&gt;बॉस के हर अच्छे बेहूदे मजाक पर मुंह फाड़ हँसना&lt;br /&gt;अठन्नी बचाने के नाम पर, हजारों का नुकसान कराना&lt;br /&gt;काम के बोझ से मर जाने के नखरे कर, दूसरों पर लदवाना&lt;br /&gt;घोड़े की तरह आँख के दोनों ओर तख्ती लगवा लेना&lt;br /&gt;चूतियापे को स्वीकार करना, चूतियों को सर नवाना&lt;br /&gt;हर प्रश्न, हर मौलिक विचार की जड़ों में मट्ठा डाल देना&lt;br /&gt;अंतरात्मा की आवाज़ को अनसुना कर, सप्रयास दबाना&lt;br /&gt;वास्तविक काम को स्टाइलशीट की तलवार से&lt;br /&gt;चुपचाप कटते देखना &lt;br /&gt;नए खून को स्टाइलशीट के रेफ्रीजरेटर में&lt;br /&gt;ठंडा होते महसूस करना&lt;br /&gt;बौद्धिक विद्रोह को स्टाइलशीट के रोलर तले&lt;br /&gt;कुचलने में मददगार होना&lt;br /&gt;ख़ुद स्वयं को मरते देखना और आंखे फेर लेना&lt;br /&gt;हाँ ! सबसे खतरनाक है&lt;br /&gt;एक पत्रकार का स्टाइलशीटिया हो जाना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ये कविता मेरे मित्र &lt;a href="http://khoyachand.blogspot.com/2009/01/blog-post.html"&gt;पशुपति&lt;/a&gt; ने अपने ब्लॉग पर छापी है.... और अब मैं इसे अपने ब्लॉग पर डाल रहा हूं उसकी अनुमति के साथ.... ये कविता (जिसे दरअसल मैं पाश की कविता की पैरोडी मानता था- मानता हूं) मैंने अमर उजाला के दिनों में लिखी थी। दो-एक दिन बाद मैं अजय शर्मा की कविता तहखाना भी डालूंगा- जो कि मेरी पसंदीदा है। एक कविता मैं सुधाकर पांडे की भी ढूंढ रहा हूं जो मिल नहीं रही- मिल गई तो ज़रूर डालूंगा, मुझे बेहद पसंद है और हमारे उन दिनों को पूरी तल्ख़ी से रखती है। &lt;br /&gt;यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि अब मुझे स्टाइलशीट उतनी ख़राब चीज़ नहीं लगती। शायद उम्र हो गई है- शायद आग मर गई है लेकिन अब भी मुझे लगता है कि स्टाइलशीट सब पर लागू नहीं होती। चूतियों की भरमार- पत्रकारिता में- भी कम नहीं, उन्हें थामने के लिए स्टाइलशीट होनी चाहिए लेकिन ये सब पर लागू नहीं हो सकती। जैसे कि हमारे एक बॉस कहते थे कि ऐसा नहीं होगा और ये आदेश सब पर लागू होगा....  बशर्ते आप मुझे ऐसा न करने के लिए समझा न पाएं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-2492180921261798189?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/2492180921261798189/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=2492180921261798189&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2492180921261798189'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2492180921261798189'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='स्टाइलशीटिया'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-8461026758062883585</id><published>2008-12-06T23:54:00.000-08:00</published><updated>2008-12-08T04:02:41.735-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपमान'/><title type='text'>शर्मनाक, शर्मनाक, शर्मनाक</title><content type='html'>वॉयस ऑफ़ इंडिया के नाम पर अब तक जितनी ख़राब बातें बाहर आई हैं ये उनमें सबसे बड़ी है। वॉयस ऑफ़ इंडिया के मालिकों ने जो कुकृत्य अब तक किए हैं ये उनमें सबसे बड़ा है.... वॉयस ऑफ़ इंडिया के मालिकों ने वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार का अपमान किया है.... &lt;br /&gt;वॉयस ऑफ़ इंडिया का सूत्र वाक्य है.... पैसे कमाओ, पैसे बचाओ - पत्रकारिता जाए तेल लेने। पत्रकारिता ही क्यों, प्रोफ़ेशनलिज़्म, नैतिकता, श्रम कानून सब तेल लेने जाएं। वीओआई के मालिकों ने साफ़ शब्दों में सभी अधिकारियों (चैनल हेड्स, ब्यूरो चीफ़) को साफ़ शब्दों में कह दिया था कि पत्रकारिता नहीं, बिज़नेस चाहिए... ख़बर नहीं, पैसे चाहिए। सबसे पहले आशीष मिश्रा ने इसकी मुख़ालिफ़त करते हुए इस्तीफ़ा दे दिया। एक दिन बाद बात मुकेश जी ने भी इस्तीफ़ा दे दिया लेकिन उन्होंने नोटिस भी दिया। तो वो अब भी नोटिस पीरियड में ही हैं। एक प्रोफ़ेशनल की तरह वो ऑफ़िस आते रहे, चुनाव के दौरान पावर प्ले नाम का प्रोग्राम भी कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने पेड न्यूज़ (ख़बर के रूप में दिखाया जाने वाला विज्ञापन)में किसी भी तरह शरीक होने से इनकार कर दिया है। &lt;br /&gt;ज़ाहिर है वीओआई के मालिक मुकेश जी से ख़ुश नहीं हैं। तो उन्होंने ये किया कि अपने एक पालतू को मुकेश जी पर शू कर दिया.... ये पालतू है प्रकाश पांडे.... इसके नाम से ज़्यादातर लोग वाकिफ़ होंगे... ये नाम पत्रकारिता पर एक धब्बे का है.... प्रकाश वही युवक है जिसने रातोंरात सफ़लता पाने के लिए उमा खुराना का फ़र्ज़ी स्टिंग ऑपरेशन किया था... करियर के लिए शॉर्टकट अपनाने के नाम पर इसने न सिर्फ़ उमा खुराना की ज़िंदगी तबाह की बल्कि दरियागंज के स्कूल में पढ़ने वाली सैकड़ों लड़कियों की ज़िंदगी को भी सवालों के घेरे में डाल दिया था... पता नहीं उनमें से कितनी बच्चियां और उनके मां-बाप उस हादसे से उबर पाए होंगे। अलबत्ता प्रकाश पांडे की कुछ भी कर सकने की काबिलियत वीओआई ने पहचान ली और उसे गेस्ट कोओर्डिनेशन में रख लिया... अपनी चारित्रिक विशेषताओं के कारण ये जल्द ही मालिकों का ख़ास बन गया.... &lt;br /&gt;अब मुकेश जी से परेशान वीओआई के मालिकों ने उसे ही मुकेश जी पर शू कर दिया.... पावर प्ले में एक गेस्ट को लेकर मुकेश जी ने प्रकाश को कुछ कहा तो उन्हीं पर चढ़ बैठा... गाली-गलौच करने लगा और उसने भरे न्यूज़ रूम में ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि कभी ज़ोर से न बोलने वाले मुकेश जी भी भड़क गए.... प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि वो तो मुकेश जी पर हाथव उठाने पर भी उतारू दिख रहा था (या दिखा रहा था)। इस दौरान एक, सिर्फ़ एक लड़के ने मुकेश जी के पक्ष में बोला तो वहीं खड़े मधुर मित्तल ने उसे ही डपट दिया। इसके बाद सब तमाशबीन बने रहे... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीओआई के मालिक बिल्डर हैं.... शायद उनके काम करने के ढंग में शामिल है कि वो कुछ गुंडे पालते हैं... ज़मीन पर कब्ज़ा, मज़दूरों को धमकाने वगैरा के लिए... इनमें से कुछ से साबका तो वीओआई में काम करने वाले हर कर्मचारी का हुआ होगा क्योंकि ये एचआर और एकाउंट्स के अधिकारियों में भी हैं.... वो पत्रकारों से ऐसे बात करते हैं जैसे कि वो मज़दूर हों ये मुंशी... ऐतराज़ की बात तो ये भी है लेकिन शायद बेज़ुबान पत्रकार (जी हां इनकी आवाज़ सिर्फ़ दूसरों के लिए ही निकलती है)शायद सब सहते रहने को मजबूर हैं.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल जब भी कोई संकट आता है तो आदमी का मूल चरित्र सामने आता है.... अकाल, महामारी, युद्ध के वक्त कुछ लोग हमेशा कुछ लोगों की मौज आ जाती है, वो पावरफ़ुल हो जाते हैं.... वॉयस ऑफ़ इंडिया में भी ऐसा हो रहा है.... लेकिन मुझे लगता है कि इस वक्त वॉयस ऑफ़ इंडिया में जो भी अधिकारी के रूप में काम कर रहा है वो कम-ज़्यादा पाप का भागीदार है। ख़ासतौर पर बड़े अधिकारी..... कर्मचारी तो बेचारे मजबूर हैं.... सड़क पर आने से बेगार ही भली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वॉयस ऑफ़ इंडिया में काम करना मेरे लिए आज तक का सबसे ख़राब अनुभव रहा.... लेकिन मुझे पता नहीं कि मैं ख़ुशनसीब हूं कि जब मुकेश जी का अपमान हुआ तब मैं वो देखने के लिए मौजूद नहीं था.... या मैं बदनसीब हूं कि वहां उतना सब हो गया और मैं विरोध करने के लिए मौजूद नहीं था.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल मैं शर्मिंदा हूं और गुस्सा भी हूं.... बस अब मैं ये जानना चाहता हूं कि हम लोग क्या कर सकते हैं.... हम सभी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-8461026758062883585?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/8461026758062883585/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=8461026758062883585&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/8461026758062883585'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/8461026758062883585'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='शर्मनाक, शर्मनाक, शर्मनाक'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-1223597501689719435</id><published>2008-11-12T02:13:00.000-08:00</published><updated>2008-11-12T02:16:28.546-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ख़बर-ख़बर'/><title type='text'>ओबामा और माया</title><content type='html'>मायावती और ओबामा की तुलना करने पर कई लोगों को ऐतराज़ है। ओबामा की पढ़ाई-लिखाई, सलीका और राष्ट्रपति पद तक पहुंचने की तैयारी के मुकाबले मायावती नहीं ठहरतीं... लेकिन चमत्कार करने की क्षमता मायावती में भी है....  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में मायावती ने एक बहुत मज़ेदार बयान दिया था... जिस पर हमारे कई मित्रों ने सवाल उठाया था कि कोई भी नेता सार्वजनिक रूप से इतना बेवकूफ़ाना बयान दे कैसे सकता है.... वो बयान था- कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब किसी दलित की झोपड़ी में ठहरता है तो अगले दिन उसे एक विशेष साबुन से नहलाया जाता है। -- सचमुच ऐसा बयान सिर्फ़ मायावती ही दे सकती हैं... लेकिन आप-हम इसे चाहे कितना ही बेवकूफ़ाना मानें लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि मायावती के वोटर उनकी बात पर यकीन करते हैं। &lt;br /&gt;क्यों करते हैं इसके लिए आपको मैं ओबामा की बात सुनाना चाहूंगा... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओबामा ने अपनी आत्मकथा  'ऑडैसटी ऑफ होप' में कहा है कि उनसे मिलने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति  जॉर्ज बुश जूनियर ने साबुन से हाथ धोए थे--- उन्हीं के सामने। आत्मकथा के अनुसार चार साल पहले वह (ओबामा) अन्य नवनिर्वाचित सीनेटरों के साथ राष्ट्रपति बुश से नाश्ते पर मिलने के लिए गए थे। बुश ओबामा को अलग ले गए और अपनी पत्नी लौरा से मिलवाया। उन्होंने लौरा से कहा, 'तुम्हें याद है ओबामा, इन्हें हमने टीवी पर देखा था। बहुत अच्छा परिवार। और आपकी पत्नी - प्यारी महिला हैं।' इसके बाद बुश और ओबामा ने हाथ मिलाए। ओबामा के मुताबिक इसके बाद बुश तुरंत अपने एक सहायक की तरफ मुड़े़ जिसने उनके दाहिने हाथ पर सैनिटाइजर डाला। बुश ने ओबामा से कहा, 'हाइजीन का ख्याल रखते हुए मैंने सैनिटाइजर डाला।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़बर अभी (ये पोस्ट 11 तारीख को ही लिख ली थी- तकनीकि दिक्कत की वजह से आज पोस्ट कर रहा हूं)आई है और इस पर बुश की प्रतिक्रिया नहीं मिली है। अब अगर बुश इस बात का खंडन करते हैं और जितनी चाहे ज़ोर से करें अमेरिका और पूरी दुनिया के ब्लैक लोग ओबामा की बात पर यकीन करेंगे। वो भी करेंगे जिन्होंने रंगभेद को देखा है- झेला है और किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब शायद मायावती और ओबामा में संबंध साफ़ होने लगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-1223597501689719435?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/1223597501689719435/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=1223597501689719435&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1223597501689719435'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1223597501689719435'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/11/blog-post_12.html' title='ओबामा और माया'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-2783031504998679799</id><published>2008-11-05T07:29:00.001-08:00</published><updated>2008-11-08T07:26:07.386-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>संवाद नहीं एकालाप</title><content type='html'>&lt;em&gt;ये गुस्सा है जो मैं बरसों पालता रहा हूं.... एक वरिष्ठ बन चुके पत्रकार, ब्लॉगर के प्रति। मैं इसे यहां नहीं देना चाहता था। मैंने अनिल रघुराज के मशहूर ब्लॉग पर ही ये टिप्पणी के रूप में डाला था। उनके &lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/09/blog-post_28.html"&gt;जन्मदिन की पोस्ट &lt;/a&gt;के कुछ दिन बाद। ये टिप्पणी उस पोस्ट पर की गई थी जिसमें उन्होंने जन्मदिन के बहाने खुद को भगत सिंह से तोलने की कोशिश की थी। लेकिन ये कमेंट पब्लिश नहीं हुआ। हो सकता है काफ़ी दिन बाद देखा भी न हो। लेकिन जो बात उनके प्रताड़ित लोग पीठ पीछे करते रहते हें उसे कम से कम एक बार सामने कह देना ज़रूरी है.... &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनिल जी नमस्कार &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आपको शायद याद न हो पर कुछ बातें और कुछ लोग और भी हैं जिन्हें आपको अपने जन्मदिन पर याद करना चाहिए। ऐसे लोग जिन पर आपके व्यक्तित्व की अमिट छाप पड़ी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 1998 में अमर उजाला का हरियाणा संस्करण शुरू हो रहा था। राजेश रपरिया जी संपादक थे और आप उनके दाहिने हाथ। मैं भी पंजाब केसरी से एक रेफ़रेंस लेकर पहुंचा था। आपने ने ही कॉपी लिखवाई थी- पास किया था। उसके बाद आपने मुझसे जल्द से जल्द जॉयन करने के लिए कहा था तो मैंने पूछा था कि पैसा और पद बता देते तो इस्तीफ़ा देते वक्त दिक्कत नहीं होती। आपने अपने श्रीमुख से कहा था- सब एडिटर, साढ़े चार हज़ार रुपये। पंजाब केसरी छोड़ने और अमर उजाला से जुड़ने के मोह के चलते मैं तीन दिन बाद ही जालंधर को हमेशा के लिए छोड़ यहां पहुंच गया। हां ये भी बता दूं कि मेरे लिए अमर उजाला अख़बार पत्रकारिता करने की शानदार जगह और आप शायद मेरे तब तक के सीनियर्स में सबसे तमीजदार (और आदर्श भी) लग रहे थे। {पर उसके बाद जो मोहभंग, दोनों ही पुरानी प्रतिष्ठा के आस-पास भी नहीं पहुंच पाए हो} &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली तनख्वाह मिली तो पता चला कि मैं तो ट्रेनी हूं और वेतन 4 हज़ार रुपये मात्र है। इस पर मैं फिर आपसे मिला- आपने कहा- &lt;em&gt;देखो राजेश जी अभी राजेश जी (रपरिया जी)लोगों को जांच रहे हैं, परख रहे हैं। सभी को तो सब एडिटर नहीं बनाया जा सकता। कुछ को सब एडिटर, कुछ को जूनियर सब, कुछ को सीनियर सब बनाया जाएगा। पैसा भी ठीक हो जाएगा। आपकी तो 'स्पीड' भी अच्छी है- अगले महीने सब ठीक हो जाएगा।&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगला महीना पूरा होने से पहले आप जर्मनी चल दिए थे- वॉयस ऑफ़ जर्मनी में अपनी प्रतिभा का झंडा गाड़ने। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद रपरिया जी से मिले तो उन्होंने हाथ झाड़ दिए। &lt;br /&gt;&lt;em&gt;भई अनिल से पूछो। &lt;br /&gt;सर वो तो चले गए.... &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;तो मैंने तो नहीं कहा था न&lt;/em&gt;.... &lt;em&gt;और फिर तुम लोग कोई बहुत अच्छे भी नहीं हो।&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;em&gt;सर हम लोग या मैं&lt;/em&gt;... &lt;br /&gt;&lt;em&gt;भई मैं तो सबका हिसाब नहीं रख सकता&lt;/em&gt;.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल इसी दौरान मुझे पता चला कि मैं ही नहीं मृत्युंजय, इंदु जी, शील भारद्वाज और हां शुक्ला जी भी आपके ही शिकार थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद मुझे पता चला कि आप कभी काफ़ी विद्रोही थे &lt;br /&gt;(जो आप शायद अब भी गा-बेच रहे हो) &lt;br /&gt;लेकिन फिर दुनिया बदलने का आपका मोह भंग हो गया... पर्वत सी पीर नहीं पिघल पाई, तो आप दूसरी दिशा में भागने लगे, आप वो सियार हो गए जो शेर के लिए गधों को फंसाकर लाता था। पूरी दुनिया को परिवार बनने के बजाय आप अपने परिवार और उससे भी ज़्यादा अपने लिए सोचने-करने लगे। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अब मुझे लगता है कि आपके ब्लॉग का नाम बिल्कुल सही है एक हिंदुस्तानी की डायरी। सही है हम हिंदुस्तानी स्वभाव से ढोंगी ही होते हैं, ज़ुबां में कुछ दिल में कुछ वाले। मुझे लगता है कि आपके मुकाबले आपके पिताजी काफ़ी ईमानदार आदमी रहे होंगे और आप उनकी उम्मीदों से काफ़ी आगे निकल गए हैं.... &lt;br /&gt;देर से ही सही जन्मदिन मुबारक &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(आप जैसे लोग ज़रूरी हैं- ताकि बूढ़े होते शिकारी भूखे न मर जाएं)&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/"&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-2783031504998679799?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/2783031504998679799/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=2783031504998679799&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2783031504998679799'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2783031504998679799'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='संवाद नहीं एकालाप'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-7470219618627072417</id><published>2008-10-29T09:20:00.000-07:00</published><updated>2008-10-30T23:55:27.210-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>बट सोमू कान्ट कैलकुलेट साला</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SQqrzHAot3I/AAAAAAAAAFg/OMN7F-P7l00/s1600-h/DSC00004.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SQqrzHAot3I/AAAAAAAAAFg/OMN7F-P7l00/s320/DSC00004.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5263208009079240562" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; बाल मज़दूरी मेरे लिए एक मुश्किल विषय है। कई दिन से मैं इस पर कुछ भी कहने से बच रहा हूं। दिक्कत ये है कि लिखने से तो बच सकते हैं लेकिन विषय का सामना करने से नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल पहाड़ के घरों में छोटू रखने का रिवाज नहीं है, कम से कम अब तक तो नहीं। मेरी किसी पहाड़ी परिचित के घर में गांव से लाया गया गरीब बच्चा काम करता नहीं दिखता। इसलिए मुझे अब भी घरेलू नौकर असहज भाव ही देते हैं। लेकिन पूरब में ऐसा नहीं है... वहां ये सामाजिक रूप से स्वीकार्य और शायद अनिवार्य भी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले मेरी सास आई थीं अपने घरेलू नौकर, सोमू, के साथ। सोमू अब बाल मज़दूर नहीं है वो अट्ठारह साल का युवक है। स्वस्थ युवक। लेकिन मुझे लगता है कि वो वैसा नहीं जैसा कि उसे होना चाहिए था। बहुत छोटी उम्र में सोमू को घर लाया गया था... उसे घर का काम-काज सिखाया गया और पिछले 10-12 साल से वो यही कर रहा है। मेरी श्रीमती जी कहती हैं कि उन्होंने सोमू को पढ़ाने की कोशिश भी की थी लेकिन वो नहीं पढ़ा। लेकिन ऐसा सिर्फ़ एक नौकर के साथ ही हो सकता है कि वो रुचि न दिखाए तो न पढ़े। अपने बच्चे को तो पुचकार कर या मार कर पढ़ाया ही जाएगा। हालांकि मैं ये भी बताता चलूं कि यूं सोमू की स्थिति बेहतर है। वो कोक भी पीता है और सास-बहू सीरियर भी देखता है.. गालियां नहीं खाता.... लेकिन सोमू हिसाब भी नहीं कर सकता। वो घर का पता, फ़ोन नंबर याद नहीं रख पाता- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने एक मित्र रणविजय के घर भी एक मैंने एक बच्चे नौकर को देखा। ज़ाहिर है मैने सवाल पूछा.... तो उसका कहना था कि इसके साथ ज़्यादती बिल्कुल नहीं की जाती। हालांकि 10-12 साल का ये बच्चा रात को उसके लौटने पर रोकी सेकता है... लेकिन जैसा कि रणविजय ह रहा था उसे सभी सुविधाएं दी जा रही हैं, मैं ये मान जाता हूं-- लेकिन  दिक्कत तो इस छोटू के भविष्य को लेकर है। रणविजय का कहना है कि वो छोटू को पढ़ाता है और जब तक वो जवान होगा तब तक इस काबिल बन जाएगा कि दसवीं-बारहवीं पास कर ले... कंप्यूटर ऑपरेटिंग करने लगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बच्चे को मैंने बीयर शॉप में देखा। वो ऑपरेटर की गाली खा रहा था। मैंने ऐतराज़ किया तो पता चला कि बच्चा कमचोर है- कहीं और जाकर माल उड़ाता है और खाने-पीने, कपड़े-लत्ते के अलावा 3 हज़ार रुपये महीने पाता है। 3 हज़ार रुपये कम नहीं हैं। बहुत संभव है कि वो छोटू ढाई-तीन हज़ार बचा लेता हो- घर भेजने के लिए। मैंने बच्चे से कहा कि बेटा अब गाली मत खाना.... वरना मैं शिकायत कर दूंगा और तेरी नौकरी चली जाएगी- इनका तो चाहे जो हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल मुश्किल यहीं है। मुझे कभी समझ नहीं आ पाया कि ये छोटू नौकरी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे ? अगर मां-बाप पढ़ा सकते, खिला-पिला सकते तो क्या घर पर नहीं रहते ? सवाल ये भी है कि हमारा हस्तक्षेप, ऐतराज़ उसे नौकरी से हटाने के सिवा क्या देगा ? फिर जो बच्चा घर में है,चाय के ढाबे पर है वो किसी ज़री की फ़ैक्ट्री में पहुंच जाएगा जहां उसे धूप-हवा तक नसीब होना मुश्किल हो जाएगा। मुझे हमेशा डर लगता है कि अगर मैं उसे पाल नहीं सकता तो कम से कम नौकरी तो न छुड़वाऊं... कि घर पर कई छोटे भाई-बहन उसके भेजे पैसों से पल रहे हैं। और फिर वो तो मैं बस नियोक्ता को तमीज से बर्ताव करने को कहकर रह जाता हूं। ऐसे मौकों पर मुझे हमेशा बिहार में लालू यादव के शुरू किए चरवाहा स्कूल याद आते हैं। जिन बच्चों के लिए काम करना ज़रूरी है उनके लिए काम के साथ ही पढ़ने की व्यवस्था ही नहीं होनी चाहिए ? उन्हें पढ़ने के साथ ही जल्द धन अर्जन का हुनर नहीं सिखाया जाना चाहिए ? या हम यूं ही चलने दें बड़ी-बड़ी बातें करते हुए न्यूज़ चैनलों-अख़बारों के बाहर चाय पीते हुए, जहां बर्तन धो रहा छोटू हमें सिर्फ़ बाल-दिवस पर ही दिखेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-7470219618627072417?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/7470219618627072417/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=7470219618627072417&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/7470219618627072417'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/7470219618627072417'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/10/blog-post_29.html' title='बट सोमू कान्ट कैलकुलेट साला'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SQqrzHAot3I/AAAAAAAAAFg/OMN7F-P7l00/s72-c/DSC00004.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-5046577022436528519</id><published>2008-10-27T09:14:00.000-07:00</published><updated>2008-11-02T07:12:20.132-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>जंग अभी दूर है....</title><content type='html'>कल फिर एक हॉलीवुडी फ़िल्म देखी &lt;em&gt;I AM LEGEND&lt;/em&gt; औसत फ़िल्म है। अगले ज़मानों की सोचने वालों को एक डर है कि आदमी के ग़लतियों से ऐसा कोई वायरस अटैक होगा कि सारी दुनिया नष्ट हो जाएगी। तो I AM LEGEND का हीरो वायरस अटैक के बाद दुनिया में बच गए चंद लोगों में से एक है। न्यूयॉर्क में वो अकेला ज्ञात ज़िंदा व्यक्ति है। बाकी लोग वायरस के शिकार होकर सिर्फ़ रात में निकल सकने वाले आदमखोर हो चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये पोस्ट मैंने फ़िल्म के बारे में कहने के लिए नहीं लिखी है। दरअसल मुझे लगता है कि अभी वो वक्त नहीं आया है कि दुनिया में दो ही किस्म के आदमी रह गए हैं-- संघी और वामपंथी। लेकिन जब ये दोनों बात करते हैं तो लगता है कि एक ओर वो हैं और दूसरी ओर सिर्फ़ दूसरी किस्म। यानि कि जो भी इनकी तरफ़ नहीं है वो अंधेरे में रहने वाला जीव है। मुझे नहीं लगता कि कम से कम अभी ये वक्त आ गया है कि बीच में लाइन खींचकर दोनों तरफ़ के लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन करार दिया जाए। सांप्रदायिक दंगों, एमएनएस-शिवसेना के तांडव और आज मुंबई में राहुल राज की हत्या के बावजूद मुझे लगता है कि अभी शायद कुछ इंसानियत बाकी है.... बीच का रास्ता अभी बचा हुआ है इस पर कुछ लोगों को चलने दें... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कविता मुझे सैणी साब ने सुनाई थी और भेजी है, मुझे लगता है दोनों ओर के नब्बे फ़ीसदी लोगों में गुंजाइश है... जैसा कि &lt;strong&gt;नाज़िम हिक़मत &lt;/strong&gt;कहते हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने हमें पकड़ लिया&lt;br /&gt;उन्होंने हमें तालाबंद किया&lt;br /&gt;मुझे दीवारों के भीतर, &lt;br /&gt;तुम्हें बाहर.&lt;br /&gt;मगर यह कुछ नहीं.&lt;br /&gt;सबसे बुरा होता है&lt;br /&gt;जब लोग जाने-अनजाने-&lt;br /&gt;अपने भीतर कैदखाने लिए चलते हैं...&lt;br /&gt;ज़्यादातर लोग ऐसा करने को मजबूर हुए हैं,&lt;br /&gt;ईमानदार, मेहनती, भले लोग&lt;br /&gt;जो उतना ही प्यार करने लायक हैं&lt;br /&gt;जितना मैं तुम्हें करता हूं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-5046577022436528519?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/5046577022436528519/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=5046577022436528519&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/5046577022436528519'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/5046577022436528519'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/10/blog-post_27.html' title='जंग अभी दूर है....'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-1062215026853094937</id><published>2008-10-19T09:10:00.000-07:00</published><updated>2008-10-21T02:07:02.980-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ख़बर-ख़बर'/><title type='text'>हिम्मत की मिसाल गांगुली</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;object width="320" height="266" class="BLOG_video_class" id="BLOG_video-48813009c33d9cf9" classid="clsid:D27CDB6E-AE6D-11cf-96B8-444553540000" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/get_player"&gt;&lt;param name="bgcolor" value="#FFFFFF"&gt;&lt;param name="allowfullscreen" value="true"&gt;&lt;param name="flashvars" 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टीम को फ़ाइटर बनाया- जिसका अभाव शायद हमारी टीम की सबसे बड़ी कमज़ोरी रही थी। कप्तान में हिम्मत हो तो बाकी भी भिड़ने को तैयार होते हैं। भज्जी, ज़हीर अगर आज आस्ट्रेलिया के मदमस्त गोरों की आंख में आंख डालकर जवाब दे सकते हैं तो इसका कम-ज़्यादा श्रेय गांगुली को देना ही होगा... गांगुली टीम में वापस किन परिस्थियों में आए हैं ये हम सब जानते हैं और इसके लिए सिर्फ़ उनकी हिम्मत और लगन को ही श्रेय दिया जाना चाहिए। पेप्सी का ये एड गांगुली ने तब किया था जब वो टीम से बाहर थे और क्रिकेट की राजनीति का किला यानि कि बीसीसीआई उनके खिलाफ़ थी... तब शायद ही किसी को उम्मीद रही होगी कि वो वापसी कर पाएंगे- लेकिन उन्होंने की। और उससे पहले ये ऐड किया- बाकी चीज़ों को छोड़ भी दें तो सिर्फ़ इस ऐड के लिए मैं उन्हें शताब्दी के सबसे बहादुर लोगों में शामिल करना चाहूंगा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुधीर से बात के दौरान एक ज़िक्र निकला था उसे भी दर्ज करता चलूं। चैपल और उनके चपट्टों को, और भारतीय क्रिकेट की ठेकेदार बीसीसीआई को गांगुली से दिक्कत ये थी कि वो बोलते क्यों हैं। सही बात है इस देश में सिर्फ़ उसे नहीं बोलना है जिसे इसका हक़ है। बीसीसीआई का चपरासी भी क्रिकेट का विशेषज्ञ की तरह बयान दे सकता है, राजनीति करता रह सकता है लेकिन न बोलें खिलाड़ी और कोच। सचिन तेंडुलकर बोलते नहीं हैं तो क्या कोई भी न बोले। सब सचिन जैसे महान नहीं हो सकते और न ही शांत। लेकिन ये लोग सबको उनके ढांचे में ठोकने पर आमादा हैं क्योंकि वो ढांचा सबको सूट करता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि गांगुली, कपिल, अज़हर को ज़लील कर बाहर कर दिया जाए और ऐसे नालायक बोलते रहें जिन्हें कतई खेल की तमीज नहीं है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कमाल के कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोपड़कर की एक टिप्पणी याद आती है। ये कार्टून शायद 2004 के ओलंपिक के वक्त छपा था। तब भारतीय दल में खिलाड़ियों से ज़्यादा अधिकारी थे--- कार्टून में खिलाड़ी दूर से देख रहा है और बाबू टाइप का एक पोडियम पर खड़ा है। खिलाड़ी कह रहा है-- बड़े बाबू ने कहा कि मेडल वही लेंगे वरना वो मुझे खेलने नहीं देंगे। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भारतीय खेल जगत का ये कड़वा और घिनौना सच है... &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-1062215026853094937?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='enclosure' type='video/mp4' href='http://www.blogger.com/video-play.mp4?contentId=48813009c33d9cf9&amp;type=video%2Fmp4' length='0'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/1062215026853094937/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=1062215026853094937&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1062215026853094937'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1062215026853094937'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/10/blog-post_19.html' title='हिम्मत की मिसाल गांगुली'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-932820058195312439</id><published>2008-10-17T08:11:00.001-07:00</published><updated>2008-10-17T08:41:45.852-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>ब्लॉग चर्चा</title><content type='html'>कई चीज़ें दिमाग में घुमड़ रही थीं, एक-एक करके डालूंगा। पहली चीज़ तो ये है कि ब्लॉगिंग में मेरा पहला परिचित महेंद्र महता आज मुझे नारी नाम के कम्यूनिटी ब्लॉग पर भी दिखा। तो सोचा सबसे पहले ब्लॉगिंग पर ही लिख डालूं।&lt;br /&gt;मेरे लिए ब्लॉगिंग दोस्तों के साथ गप मारने की जगह है। जैसे एक गोल टेबल के चारों ओर दोस्त बैठे हों... हालांकि ये टेबल घर में नहीं है, ये एक बार में या एक कॉफ़ी हाउस में है। ऐसी जगह में कुछ भी पूरी तरह टेबल के गिर्द बैठे लोगों के बीच ही नहीं रह सकता.... ये निजी के साथ सार्वजनिक भी हो जाता है।&lt;br /&gt;लेकिन तुलसी के लिए ये एक मंच की तरह है। वो इस पर खड़ा होकर भाषण दे रहा है, कविता सुना रहा है, लोगों को बहस के लिए पुकार रहा है। हालांकि बहुत बदतमीज़ ब्लॉगर जगत के लोग उसकी बात ही नहीं सुन रहे। लेकिन फिर भी अपना ये भाई अडिग है- लगातार बोले जा रहा है। जल्द ही ये रिकॉर्ड बना डालेगा ज़ीरो टिप्पणी वाली सबसे ज़्यादा पोस्ट के लिए... हंसना मत कोई सा, उसके ब्लॉग पर क्लिक्स की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। एक दिन कमेंट्स भी बढ़ेंगे- आमीन।&lt;br /&gt;महेंद्र महता उर्फ़ महेन उर्फ़ दही इसके विपरीत स्थिति में है.... पहले भी मैं कह चुका हूं एकाधिक बार कि ब्लॉगिंग से पहले मैं उससे कभी प्रभावित नहीं रहा.... हां मुझे वो एक भला आदमी हमेशा लगता रहा... दरअसल मेरे जैसे बकलोल और ऊंची आवाज़ में बोलने वाले लोगों के सामने धीरे से बोलने वाले लोग शायद जल्दी न पहचाने जाते हों। ब्लॉगिंग ने इसे बहुत झकास मौका दिया.... मेरे अलावा (यकीनन) और भी कई लोगों ने माना होगा कि ये शानदार लिक्खाड़ है। ब्लॉगिंग में उसके ज़्यादातर जानकार यहीं मिले लोग हैं- नए दोस्त और यही ब्लॉगिंग की सफ़लता भी है।&lt;br /&gt;महेंद्र कुछ भी लिख डालता है, 4-4 ब्लॉग चला रहा है (टाइम कहां से लाता है) तो देवेंद्र बाबू को समझ ही नहीं आता कि क्या लिखें। हालांकि वो रोज़ तीन अख़बारों में से ऐसी ख़बरें निकाल कर लाता है जो उल्लेखनीय होती हैं- अपनी विशेषज्ञ टिप्पणी के साथ। लेकिन उसे समझ नहीं आता कि क्या लिखूं-अलबत्ता धीरेश के ब्लॉग पर टोकेकर के साथ उसकी बहस उल्लेखनीय रूप से अच्छी थी। तो ये इन्हीं चीज़ों पर क्यों नहीं लिखता....&lt;br /&gt;नीरज पांडे एक ब्लॉग बनाकर बैठा है- आज तक इसने उस पर कुछ नहीं डाला। हैं जी- आशुलिपि में हर साल पुरस्कार जीतने वाला कवि, अख़बारों को आर्टिकल न छापने के लिए कोसने वाला नीरस- ब्लॉग में कुछ नहीं लिख पाता... अजीबोगरीब है.... दरअसल अजीब नहीं गरीब। अज्ञात कारणों से घर पर इंटरनेट नहीं ले पा रहा और आजतक में ब्लॉगिंग-2 खेलने की आज़ादी कहां।&lt;br /&gt;धीरेश सैणी ब्लॉग में भी वैसा ही दिखता है- जैसा वो है। ये बहुत बढ़िया बात है। इसलिए ब्लॉगिंग में उसके चाहने वाले भी वैसे ही हैं- जैसे हरियाणा, मुज़फ्फरनगर, दिल्ली में। बस स्वस्थ रहे- लोगों को गरियाता रहे।&lt;br /&gt;महेंद्र के ब्लॉग का लिंक मुझे सुशील ने भेजा था, मैंने देखा नहीं। वर्षा और धीरेश ब्लॉगिंग पर चर्चा किए करते थे- मैं बाहर रहता था। बहरहाल मैं किसी के ब्लॉग पर टिप्पणी करूं इससे पहले वर्षा की ब्लॉगिंग में अपनी पहचान बन गई थी, जो कायम है....&lt;br /&gt;बहरहाल कुछ लोग लिखना जानते हैं, कुछ पढ़ना, कुछ आते-जाते टिप्पणी करना और कुछ बस देख कर मुस्कुराना/कोने से निकल जाना... कई साल पहले मैंने महसूस किया था कि सबसे हर काम की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, न ही दबाव देना चाहिए (हालांकि ये विस्तार पाकर मौका न देने की दिशा में बढ़ सकता है- फिर भी) लोग अपने बच्चों के साथ ऐसा करते हैं और सैणी साब हर उस आदमी के साथ जिसे वो कुछ अच्छा समझते हैं।&lt;br /&gt;मैं तो काफ़ी बोल गया... सोतड़ू हूं तो क्या नींद तो खुलती है न लेकिन अपने &lt;a href="http://alahadi.blogspot.com/"&gt;अलहदी&lt;/a&gt; महाराज हम जैसों के गुरू हैं.... बहुत आगे.... उम्मीद है इस बार कुछ बोलेंगे....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-932820058195312439?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/932820058195312439/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=932820058195312439&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/932820058195312439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/932820058195312439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/10/blog-post_17.html' title='ब्लॉग चर्चा'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-2183246195668506299</id><published>2008-10-09T03:19:00.000-07:00</published><updated>2008-10-10T02:15:53.382-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>नींद क्यों आ जाती है ?</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;नींद क्यों रात भर नहीं आती- के जवाब में एक हज़ार एक कारण हो सकते हैं... नींद न आने के कारण होने वाली दिक्कतें भी इससे ज़्यादा हो सकती हैं.... लेकिन मैं बात करना चाहता हूं नींद आने पर। यूं भी मैं बहुत सोता हूं। एक बार नीरज पांडे ने कहा था (जब हम एक साथ एक फ्लैट में रहते थे) कि न जाने कैसे मेरा कमरा सोने के लिए परफ़ेक्ट बन जाता है। हालांकि मैने उसे समझाया था कि इसके लिए मैं बहुत यत्न करता हूं पर उसके लिए ये एक मज़ेदार विषय था। तो मैं सोता बहुत हूं- या ग़लत वक्त पर सोता हूं- इसलिए ज़्याता सोता दिखता हूं पर ये तय है कि मुझ आलसी के लिए नींद महत्वपूर्ण है। कल मैं पहली बार एमआरआई रूम में था। जिसने भी एमआरआई करवाया है- वो मशीन की घनघोर आवाज़ से परिचित होगा। बहुत लाउड- कानों में रुई देने के बावजूद आप आधे घंटे तक सुन्न रहते हैं। कमाल की बात ये है कि इसके बावजूद मुझे नींद आ रही थी। यही नहीं श्रीमती जी की भी- जो कि एमआरआई मशीन के अंदर घुसी हुई थी- की आंखें भारी थीं.... आश्चर्य।&lt;br /&gt;दरअसल सोने के लिए मैं बहुत युक्तियां करता हूं- अंधेरा करता हूं- कमरे को साउंडप्रूफ़ (यथासंभव) बनाता हूं (इसीलिए नीरज को मेरा कमरा गुफ़ा सरीखा लगता था- निद्रा गुफा़) लेकिन यहां तो लाइटें भी जली हुई थीं और शोर (मतलब बहुत तेज़ आवाज़) भी थी, फिर भी नींद आ रही थी।&lt;br /&gt;सोचने पर मुझे लगा कि शायद एमआरआई का शोर संगीतमय हो गया था। यानि कि एक ख़ास पैटर्न पर होने वाली आवाज़। अब अगर इसमें कोई बात नहीं है- यानि कि ऐसी भाषा जो आपको समझ नहीं आ रही सिर्फ़ कुछ आवाज़ें जो घूम-घूम कर फिर होने लगती हैं तो आपको नींद आ सकती है। शायद इसीलिए कुछ लोग ट्रैफ़िक के बीच पटरी पर सो पाते हैं (हालांकि मजबूरी और थकान से मैं इनकार नहीं कर रहा)। या फिर फ़िल्म देखते हुए लोगों के सोने का उदाहरण ठीक हो.... या फिर बस-ट्रेन का। अगर बस-ट्रेन सोते हुए नज़दीक से गुज़रे तो नींद टूट जाती है लेकिन इनके अंदर हों तो कुछ देर में नींद आने लगती है.... अभी तक तो यही समझ आ रहा है।&lt;br /&gt;वैसे जिन लोगों को एमआरआई का अनुभव प्राप्त नहीं है या जिन्हें इसके बिना मेरी बात समझ नहीं आ रही उनके लिए ये साउंड क्लिप है.... एन्जॉय&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://sotadu.lifelogger.com/media/audio0/858810_ggumuiluts_conv.flv&amp;amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://sotadu.lifelogger.com/media/audio0/858810_ggumuiluts_conv.flv&amp;amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-2183246195668506299?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/2183246195668506299/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=2183246195668506299&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2183246195668506299'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2183246195668506299'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/10/blog-post_2323.html' title='नींद क्यों आ जाती है ?'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-2418405242880984150</id><published>2008-10-09T02:36:00.000-07:00</published><updated>2011-01-19T22:54:38.472-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>घुसेड़ेगो तो निकलोगे</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SO3Ro5zgVKI/AAAAAAAAAFU/B3pHW-Gg7dE/s1600-h/{à¤•à¥�à¤¯à¤¾+à¤•à¤°+à¤°à¤¿à¤¯à¤¾+à¤¹à¥ˆ+à¤¬à¥‡}.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5255086840853058722" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SO3Ro5zgVKI/AAAAAAAAAFU/B3pHW-Gg7dE/s320/%7B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%95%E0%A4%B0+%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B9%E0%A5%88+%E0%A4%AC%E0%A5%87%7D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मैंने अभी-अभी गाड़ी चलाना सीखा है। टू-व्हीलर चलाते तो 18-20 साल हो गए। इसलिए एक बार ट्रैफ़िक फिर परेशान करता है.... बाइक पर तो आदत हो चुकी थी और बिना सोचे ही बाइक घुसेड़ देते थे फिर आगे निकल जाते थे। कार में थोड़ा डर लगता है। लेकिन कुछ ही दिन में समझ आ गया कि घुसेडे़गो नहीं तो निकल नहीं पाओगे भैया। दिल्ली की मुख्य सड़कों पर हालत थोड़ी बेहतर होती है। इसका मतलब ये नहीं कि गाड़ी चलती जाती है, इसका मतलब ये है कि आप एक लाइन में रहते हैं, चलें या रुकें। लेकिन रिंग रोड से बाहर गलियों में या कॉलोनी, मुहल्लों के छोटे चौराहों में, नोएडा-गाज़ियाबाद में तो जो घुसा वही निकला वाला सिद्धांत काम करता है। चूंकि सभी इस थ्योरी पर अमल करते हैं अर्थात सभी घुसेड़ देने के मास्टर हैं इसलिए निकलने में औसत से कई गुना वक्त लगता है यानि कि मिनटों के घंटे हो जाते हैं। टू व्हीलर वाले ऐसे में मौज करते हैं, गाड़ियों के बीच में घुस-घुस कर निकलते जाते हैं लेकिन कार वाले (या उससे भी वड़े वाहन वाले) फंस जाते हैं... अब आप गाज़ीपुर की चढ़ाई पर अटके हुए हैं... नीचे उतरने वाले सत्तर फ़ीसदी साइड पर कब्ज़ा किए हैं... बाइक वाले, साइकिल वाले, और कारें भी सिर्फ़ नार्थ-साउथ नहीं जाती दिख रहीं वो नार्थ ईस्ट भी जा रही हैं और साउथ वेस्ट भी। यानि कि आड़े-तिरछे फंसे हैं कि जहां जगह मिले वहीं चल दें.... अब झींखते रहिए, चिल्लाते रहिए या मौका मिलते ही ज़रा से गैप में गाड़ी घुसेड़ दीजिए.... क्योंकि इस ट्रैफ़िक पर नियम काम नहीं करते, न ही हमें ट्रैफ़िक सेंस है....... &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;{तस्वीर साभार गूगल}&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-2418405242880984150?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/2418405242880984150/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=2418405242880984150&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2418405242880984150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2418405242880984150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/10/blog-post_09.html' title='घुसेड़ेगो तो निकलोगे'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SO3Ro5zgVKI/AAAAAAAAAFU/B3pHW-Gg7dE/s72-c/%7B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%95%E0%A4%B0+%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%B9%E0%A5%88+%E0%A4%AC%E0%A5%87%7D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-2179801801906712886</id><published>2008-10-06T08:03:00.000-07:00</published><updated>2008-10-06T08:09:02.284-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ख़बर-ख़बर'/><title type='text'>सलवा जुडूम की जीत</title><content type='html'>माओवादियों के लिए एक ख़राब ख़बर छत्तीसगढ़ से है... उम्मीद कम है कि इसे टीवी, अख़बार की हेडलाइन्स में जगह मिल पाए इसलिए यहां दे रहा हूं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी एक रिपोर्ट में नक्सलियों की गतिविधियों पर काबू पाने के लिए शुरू किए गए सलवा जुडूम को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार को क्लीन चिट दे दी है। आयोग के तीन सदस्यीय पैनल ने 118 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहा है कि कानून को लागू करने वाले जब स्वयं अप्रभावी हो या मौके पर मौजूद नहीं रहे तो ऐसी स्थिति में जनजातियों को आत्मरक्षा का अधिकार दिए जाने से इनकार नहीं किया जा सकता। उप महानिरीक्षक सुधीर चौधरी के नेतृत्व वाले दल ने नक्सलवाद से निपटने के लिए जनजातियों को हथियार देने पर छत्तीसगढ़ सरकार को क्लीन चिट दी है। रिपोर्ट के अनुसार सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं के विरूद्ध 550 शिकायतें मिलीं थी जिनमें से 168 की जांच गई और ये सभी शिकायतें फर्जी पाई गईं क्योंकि जिन ग्रामीणों के सलवा जुडूम अभियान के तहत या सुरक्षा बलों द्वारा मारे जाने की शिकायत की गई थी वास्तव में उनकी हत्या नक्सलियों ने की थी। रिपोर्ट में सलवा जुडूम की तारीफ करते हुए कहा गया है कि आंदोलन के कार्यकर्ताओं को नक्सली चुन चुन कर मार रहे हैं तथा सलवा जुडूम के नेताओं की रैलियों पर हमले हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार अनेक मामलों में दर्ज पुलिस प्राथमिकताओं की जांच करने पर पाया गया है कि जिन लोगों को मृत बताया गया है उनमें अनेक लोग जीवित हैं। बहुत से लोगों की स्वाभाविक मृत्यु भी फर्जी ढंग से आंदोलन कार्यकर्ताओं द्वारा हत्या बताई गई है। आयोग के दल ने अपनी रिपोर्ट में अहिंसक सलवा जुडूम आंदोलन को हिंसक बनाने की कोशिशों के लिए नक्सलियों को जिम्मेदार ठहराया है।&lt;br /&gt;जी हां ये मानवाधिकार आयोग का बयान है संघ के सहयोगी दल का नहीं।&lt;br /&gt;ख़ास बात ये है कि सलवा जुडूम आंदोलन माओवादियों की ज़्यादतियों के खिलाफ़ उभरा पूर्णत: स्वत: स्फूर्त आंदोलन है। 'सलवा-जुडूम बस्तर की गोंड़ी बोली का शब्द है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है। सलवा का अर्थ है शांति। जुडूम का मतलब होता है- जुड़ना, एकत्र होना, साथ-साथ आना। जब दोनों शब्द मिल जाते हैं, तब इसका अर्थ होता है, 'शांति अभियान। जैसा कि मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है.... ये शांतिपूर्ण आंदोलन था और नक्सली इसे हिंसक बनाने में लगे थे। तो सरकार क्योंकि नक्सल प्रभावित इलाकों में जाने में नाकाम रही इसलिए उसने लोगों के आंदोलन को समर्थन दे दिया। राज्य सरकार ने जनजातियों को नक्सलियों के विरूद्ध आत्मरक्षा के लिए हथियार दे दिए हैं।&lt;br /&gt;दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका में उन आरोपों पर गंभीर रुख अपनाया था जिनमें कहा गया है कि सलमा जुडूम कार्यकर्ता निर्दोष लोगों पर जुल्म ढा रहे हैं और लोगों से जबरन धन वसूली में लिप्त हैं। मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि नक्सली हिंसा की समस्या का मूल कारण लोगों का बेरोजगारी की वजह से सामाजिक आर्थिक विकास से वंचित रहना है। इस समस्या से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति बनाने की आवश्यकता है। आयोग के पैनल ने जनहित याचिका में लगाए गए आरोपों की कड़ी भ‌र्त्सना की है। एक और उल्लेखनीय तथ्य रिपोर्ट में ये है कि इस अध्ययन के दौरान पैनल के सदस्यों पर नक्सलियों ने तीन बार हमला किया। शायद उन्हें पता लग गया था कि ये दल सच्चाई खोल देगा और इसे संघ का एजेंट साबित करना आसान भी नहीं होगा।&lt;br /&gt;जगदलपुर (छत्तीसगढ़) के पूर्व विधायक &lt;a href="http://srijansamman.blogspot.com/2008/06/blog-post_14.html"&gt;वीरेंद्र पांडे &lt;/a&gt;का कहना है कि-----&lt;br /&gt;पिछले पच्चीस वर्षों से नक्सली दक्षिण बस्तर में सक्रिय हैं। उनके अभेद्य गढ़ में सरकार भी जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती... लेकिन सलवा-जुडूम ने सब उलट-पुलट कर रख दिया.... सलवा-जुडूम की तेजी के चलते माओवादियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है.... वे इस अभियान को किसी भी कीमत पर नेस्तनाबूद करना चाहते हैं... उनकी रणनीति का पहला अंग है आतंक...... माओवादियों की रणनीति का दूसरा हथियार है निंदा अभियान। समाचार माध्यमों में अपने प्रच्छन्न समर्थकों द्वारा सलवा-जुडूम के अत्याचार की झूठी कहानियां, रिपोर्ट छपवाना। सलवा-जुडूम बंद करने की मांग करना। इन सब निंदा अभियान का एक ही मकसद है, किसी भी प्रकार हो यह अभियान बंद हो जाए। माओवादियों को इस दिशा में कुछ सफलता तो जरूर हाथ लगी है। यह अभियान शिथिल हो गया है। तीसरा तरीका जो इन्होंने अपनाया है, वह है न्यायालय का उपयोग। नक्सली अपने कुछ संघम सदस्यों को सलवा-जुडूम पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करते हैं। झूठी कहानियां लेकर न्यायालय के दरवाजे जाते हैं। इससे भी उन्हें प्रचारात्मक लाभ मिलता है।&lt;br /&gt;इसी सब के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार आयोग को मामले की जांच करने को कहा था जिसकी रिपोर्ट आज फ़ाइल की गई....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-2179801801906712886?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/2179801801906712886/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=2179801801906712886&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2179801801906712886'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2179801801906712886'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/10/blog-post_06.html' title='सलवा जुडूम की जीत'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-5518645414431087133</id><published>2008-10-02T01:34:00.000-07:00</published><updated>2008-10-06T08:11:13.930-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फोटुआं'/><title type='text'>डिज़्नी वालों का कमाल</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SOSITmM03eI/AAAAAAAAAFM/eIguHbQDi4c/s1600-h/dfa-twi3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5252472935674076642" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SOSITmM03eI/AAAAAAAAAFM/eIguHbQDi4c/s320/dfa-twi3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ये फ़ोटो मुझे वॉल्ट डिज़्नी की साइट पर मिली.... इस कैप्शन के साथ &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;em&gt;Walt Disney, with a dignitary, on a Jungle Cruise Boat.&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बोले तो ये कमबख़्त क्या नेहरू को नहीं पहचानते.... &lt;/div&gt;&lt;div&gt;या ये वही तरीका है जो हमारे यहां कुछ मीडिया हाउस के मालिक इस्तेमाल करते हैं। ...श्री सोनिया के साथ, ...श्री मनमोहन के साथ, ...श्री आडवाणी के साथ । लेकिन ये तो ऐतिहासिक कमाल कर दिया वॉल्ट डिज़्नी के चेलों-चपाटों ने। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस साइट का लिंक है.... &lt;a href="http://www.justdisney.com/walt_disney/pictures/pictures.html"&gt;http://www.justdisney.com/walt_disney/pictures/pictures.html&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-5518645414431087133?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/5518645414431087133/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=5518645414431087133&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/5518645414431087133'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/5518645414431087133'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='डिज़्नी वालों का कमाल'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SOSITmM03eI/AAAAAAAAAFM/eIguHbQDi4c/s72-c/dfa-twi3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-1239933937258792528</id><published>2008-09-25T10:43:00.001-07:00</published><updated>2008-10-06T08:09:52.554-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फोटुआं'/><title type='text'>तस्वीर वही, नज़र अलग</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvN4rjIasI/AAAAAAAAAFE/gPIx4uKD6jo/s1600-h/0191547_week4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5250016164276890306" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvN4rjIasI/AAAAAAAAAFE/gPIx4uKD6jo/s320/0191547_week4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;ये तस्वीर बाढ़ पीड़ित उड़ीसा की है। उड़ीसा में भी बाढ़ आई है और इससे करीब 40 लाख लोग प्रभावित हुए हैं... करीब एक लाख लोगों तक अभी तक सहायता नहीं पहुंच पाई है, अब तक 50 लोगों की मौत हो गई है, 24 अरब रुपये का नुक्सान हुआ है।&lt;br /&gt;लेकिन उड़ीसा की बाढ़ उस तरह ख़बर नहीं बन रही जैसे कि बिहार की।&lt;br /&gt;क्या ये इसलिए कि बिहार की बाढ़ अप्रत्याशित थी, नई जगह आई थी और उड़ीसा का बाढ़ रुटीन है।&lt;br /&gt;क्या ये इसलिए कि उड़ीसा की बाढ़ प्राकृतिक है और बिहार की बाढ़ आदमी की ग़लतियों का नतीजा है।&lt;br /&gt;या ये इसलिए है कि मीडिया में उड़िया कम हैं, बिहारी ज़्यादा। हिंदी ब्लॉगिंग में भी। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-1239933937258792528?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/1239933937258792528/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=1239933937258792528&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1239933937258792528'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1239933937258792528'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/blog-post_3435.html' title='तस्वीर वही, नज़र अलग'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvN4rjIasI/AAAAAAAAAFE/gPIx4uKD6jo/s72-c/0191547_week4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-5586472046826681247</id><published>2008-09-25T10:41:00.000-07:00</published><updated>2008-10-06T08:10:03.749-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फोटुआं'/><title type='text'>तस्वीर वही, नज़र अलग</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvNXnX95NI/AAAAAAAAAE8/kq4RxLaEa4c/s1600-h/0191751_week7.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5250015596220638418" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvNXnX95NI/AAAAAAAAAE8/kq4RxLaEa4c/s320/0191751_week7.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;ये प्रचंड हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल यानि कि प्रचंड। प्रचंड नेपाली माओवादियों के नेता हैं और उन्हें शायद इस बात का मलाल होगा कि वो क्रांति करते-करते भी लोकतांत्रिक तरीक से ही सत्ता परिवर्तन कर सके। लेकिन सत्ता बहुत कुछ सिखाती है... और इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण ये तस्वीर है। सशस्त्र क्रांति के ये नेता सिर झुकाए जानते हैं न कहां खड़े हैं.... राजघाट पर।&lt;br /&gt;जी हां अहिंसा के पुजारी को सशस्त्र क्रांति के सेनापति का नमन।&lt;br /&gt;है न ख़ूबसूरत &lt;p&gt;{तस्वीर- साभार बीबीसी}&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-5586472046826681247?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/5586472046826681247/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=5586472046826681247&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/5586472046826681247'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/5586472046826681247'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/blog-post_425.html' title='तस्वीर वही, नज़र अलग'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvNXnX95NI/AAAAAAAAAE8/kq4RxLaEa4c/s72-c/0191751_week7.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-7635860883555210612</id><published>2008-09-25T09:48:00.000-07:00</published><updated>2008-10-06T08:10:21.893-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फोटुआं'/><title type='text'>तस्वीर वही, नज़र अलग</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvCyY-nt9I/AAAAAAAAAEc/yh82QjXUym0/s1600-h/0191957_week12.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5250003961584793554" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvCyY-nt9I/AAAAAAAAAEc/yh82QjXUym0/s320/0191957_week12.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ये तस्वीर उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग में एक कार्यक्रम के दौरान बच्चों के एक आइटम की है। कभी हम भी स्कूल में पीटी करने जाया करते थे... इतना भव्य तो नहीं, लेकिन वो भी अच्छा दिखता था। ख़ास बात ये है कि तब भी हममें से कुछ दाएं कि बजाय बाएं रोल कर जाते थे, ग़लत हाथ या पैर उठा देते थे, ग़लत वक्त पर ताली बजा देते थे.... ये बच्चियां भी ऐसा ही कुछ कर रही हैं.... इतनी सारी लड़कियों में दो की रस्सी एक पोज़ीशन पर ढूंढना आसान नहीं है। मशीनें होतीं तो एक जैसी होतीं.....&lt;br /&gt;ग़लतियां ही आदमी की ख़ूबसूरती है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;{तस्वीर- साभार बीबीसी}&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-7635860883555210612?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/7635860883555210612/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=7635860883555210612&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/7635860883555210612'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/7635860883555210612'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/blog-post_25.html' title='तस्वीर वही, नज़र अलग'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SNvCyY-nt9I/AAAAAAAAAEc/yh82QjXUym0/s72-c/0191957_week12.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-2154771812461164735</id><published>2008-09-24T04:01:00.000-07:00</published><updated>2008-10-06T08:09:17.066-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ख़बर-ख़बर'/><title type='text'>सीईओ की मौत/update</title><content type='html'>बस कुछ देर पहले ख़बर आई कि श्रम मंत्री ऑस्कर फ़र्नांडीज़ ने अपने बयान के लिए माफ़ी मांग ली। बयान कि---&lt;br /&gt;मैं कंपनियों के प्रबंधन से अपील करता हूं कि कर्मचारियों के मामले में संवेदनशीलता से सोचें। स्थायी कर्मचारियों और ठेके के कर्मचारियों के वेतन में भारी अंतर होता है। कर्मचारियों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे ग्रेटर नोएडा जैसी घटना फिर से घटे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुखद घटनाक्रम है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-2154771812461164735?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/2154771812461164735/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=2154771812461164735&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2154771812461164735'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2154771812461164735'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/update.html' title='सीईओ की मौत/update'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-1714035591779066575</id><published>2008-09-24T02:08:00.001-07:00</published><updated>2008-10-06T08:09:31.417-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ख़बर-ख़बर'/><title type='text'>सीईओ की मौत</title><content type='html'>नोएडा में इतालवी कंपनी कंपनी ग्रेजियानो ट्रांसमिशियोनी के सीईओ एल. के. चौधरी की हत्या गुस्साए मज़दूरों ने कर दी.... ये दुर्घटना बेहद हिलाने वाली है। इस पर संक्षेप में दो-तीन बातें कहना चाहता हूं....&lt;br /&gt;मेरी जानकारी में ये हाल के वक्त में ये इस तरह की पहली घटना (दुर्घटना) है। वरना अक्सर गुड़गांव में होंडा कर्मचारियों की पिटाई जैसी ही वारदातें होती रही हैं। इसका मतलब ये कतई नहीं कि मैं चौधरी साहब की हत्या को जस्टीफ़ाई कर रहा हूं- ये कभी नहीं हो सकता। कोई नहीं, ख़ुद मज़दूर भी नहीं- जो कभी-भी बाहर धकेल दिए जाते हैं- इसका समर्थन कर सकते हैं। फिर ये भी सही है कि इस दुर्घटना से ज़्यादा कॉर्पोरेट जगत से ज़्यादा नुक्सान मज़दूरों का ही होगा।&lt;br /&gt;उद्योग जगत ने इस दुर्घटना की निंदा की है। निवेश पर ख़राब असर पड़ने वाला बताया है। यूपी छोड़ देने की चेतावनी दी है। ये भी कहा जा रहा है कि ज़्यादातर कंपनियां ऐसी समस्याओं से जूझ रही हैं। संभव है कि ये सही हो और जैसे-जैसे अमेरिका से मंदी हमारी नौकरियों तक आएगी, ये दिक़्क़तें बढ़ेंगी ही- मज़दूर-मैनेजमेंट दोनों के लिए।&lt;br /&gt;ऐसे में श्रम मंत्री का बयान आश्चर्यजनक और राहत भरा है। ऑस्कर फ़र्नांडीज़ ने इस दुर्घटना को मैनेजमेंट के लिए चेतावनी बताया है। पर सवाल ये है कि सरकार ऐसा कब तक होने देगी।&lt;br /&gt;दिक्कत ये है कि जब तक काम की शर्तें साफ़ नहीं होंगी, खुला मोल-तोल चलने दिया जाएगा तब तक लाठी के ज़ोर पर चीज़ें तय करने की कोशिश भी रहेगी। ठेकेदार होंगे- लठैत होंगे, विद्रोही पनपेंगे। अब या तो आप वर्ग संघर्ष के ज़रिये क्रांति का इंतज़ार करें या ज़िम्मेदार राज्य के नाते शर्तें साफ़ करें- जिसमें वंचितों का ख़्याल रखा जाए।&lt;br /&gt;असंगठित क्षेत्र के मजदूरों से संबंधित विधेयक को इसी मानसून सत्र में पेश किया जाना है। दरअसल ये पेश हो जाना चाहिए था, लेकिन विश्वास मत के चलते मानसून सत्र जुलाई-अगस्त के बजाय अक्टूबर नवंबर में पहुंच गया। इस विधेयक से माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि सभी राज्य सरकारें राज्यों के असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा देने के लिए योजनाएं तैयार करें। यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि जो योजनाएं तैयार की जाएं उन्हें ठीक तरीके से लागू किया जाए। इन मजदूरों के लिए पृथक श्रमिक बोर्ड के गठन का भी प्रस्ताव है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए केंद्र के स्तर पर भी एक बोर्ड का गठन होगा जो पूरे देश में इस दिशा में उठाए जा रहे कदमों की समीक्षा करेगा। ये काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था लेकिन महिला आरक्षण की तर्ज पर कुछ विधेयकों के लिए कभी देर नहीं होती। देर लगती है तो सांसदों, विधायकों के भत्ते बढ़ाने में।&lt;br /&gt;असंगठित क्षेत्र में देश के 93 (अब 94) फ़ीसदी श्रमिक हैं। चूंकि ये असंगठित हैं इसलिए इनकी कोई सामूहिक ताकत नहीं। इसलिए जितना शोर छठे वेतन आयोग को लेकर होता है उसका शतांश भी असंगठित क्षेत्र के लिए प्रस्तावित विधेयक पर नहीं उठता।&lt;br /&gt;इस मसले पर इंटरनेट पर ख़बरें देख रहा था तो एक उल्लेखनीय तथ्य ये मिला कि अमेरिका में सर्वाधिक कमाऊ युवा सीईओ में दो भारतीय (मूल के) भी हैं। प्रसिद्ध बिजनेस पत्रिका फो‌र्ब्स द्वारा तैयार इस सूची में प्रकाशन क्षेत्र की माहिर साफ्टवेयर कंपनी एडोब के शांतनु नारायणन को 5 वां तथा बीपीओ दिग्गज काग्नीजेंट के फ्रांसिस्को डिसूजा को 15वां स्थान मिला है।&lt;br /&gt;एक तथ्य ये भी है कि टॉप मैनेजमेंट और कर्मचारी के बीच में फ़र्क बढ़ रहा है.... एक कल्पना है डेमोलिशन मैन नाम की फ़िल्म में। इसमें भविष्य की दुनिया की तस्वीर है.... बहुत साफ़-सुथरी, लोग होने वाले अपराधों के नाम तक भूल गए हैं। खाने के नाम पर भरी हुई थालियां नहीं बस मुट्ठी भर चीज़ें हैं- जिनमें शरीर के लिए ज़रूरी सब चीज़ें हैं। सेक्स के लिए ये लोग शारीरिक संपर्क नहीं करते बल्कि दिमाग से ही उसकी अनुभूति कर संतुष्ट हो जाते हैं। लेकिन उसी वक्त में ज़मीन के नीचे एक और दुनिया है। ये लोग हमारे (तीसरी दुनिया के) ही ढंग से जीते हैं। गरीब और गंदगी से भरे हुए। ये लोग कभी-कभी अंडरग्राउंड दुनिया से बाहर आकर खाने की चीज़ों के लिए साफ़-सुथरे लोगों पर हमला करते हैं।&lt;br /&gt;कभी-कभी मुझे डर लगता है कि क्या ये डरावनी कल्पना सही होने जा रही है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-1714035591779066575?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/1714035591779066575/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=1714035591779066575&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1714035591779066575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/1714035591779066575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/blog-post_24.html' title='सीईओ की मौत'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-2235713855421769033</id><published>2008-09-18T08:38:00.000-07:00</published><updated>2008-09-18T08:43:11.460-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही'/><title type='text'>राष्ट्रगान का विज्ञापन</title><content type='html'>&lt;p&gt;एक विज्ञापन है, जनहित का--- राष्ट्रगान का सम्मान- राष्ट्र का सम्मान। ख़ूबसूरत ऐड है- बहुत बढ़िया बना है। (पता नहीं कहीं और दिखता है या नहीं हमारे चैनल पर तो अक्सर दिखता है क्योंकि नए लॉंच हुए इस चैनल पर विज्ञापन हैं नहीं अभी) स्कूल से लौट रही एक बच्ची अपनी मां के पेट पर हाथ मारती है और ...... खिलाने के लिए खींच ले जाती है.... अपनी कुछ महिलाएं गोलगप्पे खा रही हैं- गोलगप्पे उड़ने लगते हैं, ज़मीन पर उल्टे पड़े भिखारी के पास कोई लड्डू रख जाता है कि तभी हवा चलने लगती है- अचेतन दिख रहा भिखारी नोट पकड़ता है.... घड़ीसाज़ एक आंख पर लेंस लगाए पुर्ज़े बैठा रहा है कि चाय में पानी की बूंद टपकती है। बारिश होने लगी है। एक बूढ़ा मोची अपना सामान संभालता है... पन्नी से ढकता है। उसके बगल में तीन बच्चे बैठे हैं.... वो हंस रहे हैं.... बारिश तेज हो रही है बूढ़ा मोची रेडियो ट्यून करता है.... उसमें शुभा मुद्गल राष्ट्रगान गा रही हैं.... वो बच्चों की ओर देखता है फिर उठने लगता है.... बैसाखी पर बूढ़ा हाथ कसता है... अपनी डेढ़ टांग के साथ वो खड़ा हो जाता है.... उसे देख तीनों बच्चे भी खड़े हो जाते हैं..... बूढ़े के पुराने चश्मे पर पानी की बूंदें हैं जिनसे पार शायद ही दिख रहा हो.... इन चारों के बगल में लोग भीगने से बचने के लिए खड़े हो रहे हैं..... इनके आगे से एक लड़का और लड़की बारिश से बचते हुए दौड़ते हैं.... सिर्फ़ यही तीन खड़े रहते हैं.... फिर एड की पंचलाइन आती है.... राष्ट्रगान का सम्मान, राष्ट्र का सम्मान। मेड बाय........... सवाल ये है कि क्या ये राष्ट्र सिर्फ़ गरीब बूढ़े और उसके जैसे ही गरीब बच्चों का है.... या इस राष्ट्र का सम्मान सिर्फ़ इन्हीं के मन में रह गया है.... हो सकता है कि सिर्फ़ यही लोग इस संदेश का सम्मान करते हों। मेरी जानकारी में कम ही लोग हैं जो राष्ट्रगान सुनते ही खड़े हो जाएं... इसकी वजह अलग-अलग हो सकती हैं। कुछ को समझ नहीं आता कि इससे राष्ट्र के लिए समर्पण कैसे पता चलता है। कुछ शैलेष मटियानी को कोट करते हुए इस गीत को राष्ट्रगान के लिए ग़लत चयन बताते हैं। कुछ के लिए राष्ट्रगान पर सावधान होने के बजाय दूसरी चीज़ें महत्वपूर्ण हैं, ये बहस भी हो सकती है और मस्ती भी। कुछ तो इस देश में ग़लती से फंसे हुए हैं... उन्हें या तो कहीं क्रांति में शरीक होना था, डॉलर बटोरने थे। उनके लिए या तो ये देश संवेदनहीन मध्यवर्ग का है या ज़मीन पर लोगों को कुचलते नवधनाढ्यों का या विज्ञापन में दर्शित गरीबों का.... बहरहाल उनका नहीं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पहले तो राष्ट्रगान टीवी पर अक्सर बजता था, रेडियो पर कभी-भी सुनाई देता था, सिनेमाहॉलों में फ़िल्म देखने जाओ तो वहां भी मिलता था.... लेकिन अब तो ज़्यादातर को ठीक से याद नहीं कि राष्ट्रगान कब सुना था... न ही इसकी ज़रूरत महसूस होती है। सचमुच ! &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-2235713855421769033?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/2235713855421769033/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=2235713855421769033&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2235713855421769033'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/2235713855421769033'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/blog-post_18.html' title='राष्ट्रगान का विज्ञापन'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-5458005621554249939</id><published>2008-09-17T06:56:00.000-07:00</published><updated>2008-09-17T07:21:44.717-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तजवीज़'/><title type='text'>टाइम ख़राब (द सीज)</title><content type='html'>कल पूरी रात बर्बाद हो गई (पूरी नहीं, बीयर नहीं होती तो पूरी बर्बाद होती)&lt;br /&gt;कल 'द सीज' नाम की फ़िल्म देखी।&lt;br /&gt;डेंज़ल वाशिंगटन और ब्रूस विलिस के चक्कर में ले गया था.... लेकिन अफ़सोस&lt;br /&gt;हिंदी मसाला फ़िल्म की तरह ऊटपटांग। थोड़ी सी और आगे जाती तो मिथुन चक्रवर्ती की फ़िल्म हो जाती। सौ फ़ीसदी टाइम ख़राब&lt;br /&gt;आतंकवाद अमेरिका में बहुत बिकने वाला विषय है। ख़ासतौर पर ९-११ के बाद। ये न सिर्फ़ लोगों की भावनाओं से जुड़ता है बल्कि इसमें एक्शन की भी भरपूर गुंजाइश होती थी। इस विषय पर कुछ अच्छी फ़िल्में भी बनी हैं... उनके नाम फिर कभी। तो इस विषय में पूरी गुंजाइश थी एक अच्छी-एंटरटेनिंग फ़िल्म बनने की। डेंज़ल वाशिंगटन, ब्रूस विलिस के अलावा सहायक रोल में एक्टर (नाम पता नहीं) बहुत अच्छी टीम बनती थी.... लेकिन कहानी का ही अता-पता नहीं। सिर्फ़ सब्जेक्ट से ही तो फ़िल्म नहीं बन जाती भाई।&lt;br /&gt;ये वो वक्त भी नहीं कि लोगों के पास विकल्प नहीं होते थे रामानन्द सागर ने ऐतिहासिक रूप से घटिया प्रोडक्शन कर रामायण के नाम पर ऐतिहासिक कमाई कर डाली.... महाभारत भी बिका- पर उसका प्रोडक्शन अपेक्षाकृत बेहतर था। अब केकता कपूर तमाम मसालों के बावजूद कमाल नहीं कर पा रही....&lt;br /&gt;हालांकि मुझे पता नहीं कि ये फ़िल्म अमेरिका में कितनी चली पर उम्मीद तो कर ही सकता हूं कि सुधी दर्शकों ने नकार दी होगी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो अगर मेरे अनुभव से फ़ायदा लेना है कि कृपया इस सीज़ से बचें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-5458005621554249939?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/5458005621554249939/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=5458005621554249939&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/5458005621554249939'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/5458005621554249939'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/blog-post_17.html' title='टाइम ख़राब (द सीज)'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-8990027107795081810</id><published>2008-09-09T22:55:00.000-07:00</published><updated>2008-09-09T23:08:56.144-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तजवीज़'/><title type='text'>dejavu</title><content type='html'>कल DEJAVU देखी। देजा वू यानि कि पूर्वानुभव। कुछ दिन हुए ट्रेलर देखा था एक डीवीडी में... दो वजहों से देखना तय किया... एक तो साइंस फ़िक्शन है- टाइम ट्रेवलिंग पर बेस्ड। दूसरी- डेंज़ल वाशिंगटन। ये दोनों वजहें मूवी को देखने लायक बनाती हैं- ये देखने के बाद कह रहा हूं। प्लॉट यूं है कि एक बोट (फ़ेरी) में विस्फ़ोट के बाद एक एटीएफ़ एजेंट (वाशिंगटन)  जांच में जुटता है। इसी दौरान उसे एक लड़की की लाश भी मिलती है- जो विस्फ़ोट से पहले मारी गई थी, लेकिन ये दिखाने की कोशिश थी कि वो विस्फ़ोट में मरी है। इसी दौरान जांच को एफ़बीआई अपने हाथ में ले लेती है और वाशिंगटन को उसमें शामिल किया जाता है। फिर वैज्ञानिकों की एक टीम टाइम ट्रैवल सिस्टम (बैक टू द फ़्यूटर की तरह कार नहीं) के साथ बैठी मिलती है, जो सिर्फ़ वक्त में पीछे जाकर देख सकते हैं- बेशक कुछ शर्तों के साथ.... अब जद्दोजहद,  वाशिंगटन वक्त में वापस जाने में कामयाब हो जाता है.... वगैरा-वगैरा&lt;br /&gt;साइंस फ़िक्शन मुझे हमेशा से अपील करता है (हालांकि बेसिक थ्योरी भी समझ नहीं आ पाती), ख़ासतौर पर टाइम ट्रैवल। शायद दुनिया में सबसे ज़्यादा पसंद की जाने वाली थ्योरी भी यही होगी..... हर आदमी अपनी ग़लतियां सुधार लेना चाहता है.... चाहे वो गांधी हो या हिटलर। लेकिन एक बार टाइम ट्रैवलिंग की सभी कहानियों (मेरे लिए फ़िल्मों) में एक समान है... वो ये कि टाइम ट्रैवलिंग ज़रूर घटनाओं का क्रम तय करती है। यानि कि अगर मैं अगर कुछ घटित हो चुका बदलने भूतकाल में जाता हूं तो होता ये है कि जो मैं बदलता हूं उसका असर पहले ही मेरे वर्तमान पर दिखाई देता है.... टर्मिनेटर, देजा वू, बैक टू द फ़्यूचर सबमें ये एक तथ्य कॉमन है...&lt;br /&gt;अलबत्ता तजवीज़ ये है कि देजा वू देखी जाने योग्य फ़िल्म है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-8990027107795081810?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/8990027107795081810/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=8990027107795081810&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/8990027107795081810'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/8990027107795081810'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/dejavu.html' title='dejavu'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-986312275740201609</id><published>2008-09-01T04:36:00.000-07:00</published><updated>2008-09-01T04:42:30.902-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तजवीज़'/><title type='text'>धर्म</title><content type='html'>कल धर्म देखी। पंकज कपूर सचमुच कमाल है। भावना तलवार नाम की महिला का मैं पहले परिचय में ही फ़ैन हो गया। डायरेक्शन सूपर्ब है, एक्टरस शानदार हैं, सिनेमेटोग्राफ़ी लाजवाब है। कुल मिला कर तुरंत देखने लायक फ़िल्म है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-986312275740201609?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/986312275740201609/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=986312275740201609&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/986312275740201609'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/986312275740201609'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='धर्म'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8189282959156785963.post-8984166180295738511</id><published>2008-08-27T07:17:00.000-07:00</published><updated>2008-08-27T07:18:17.295-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अमर उजाला (99-03) के दौरान लिखी गई जब सहारा में हो गया था'/><title type='text'>वहां और यहां</title><content type='html'>&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहां मोह है&lt;br /&gt;यहां मोहभंग है।&lt;br /&gt;वहां स्थायित्व है, ठहराव है&lt;br /&gt;यहां विकल्प हैं, बेचैनी है।&lt;br /&gt;वहां विकल्पहीनता है, कुंठा है&lt;br /&gt;यहां रह जाने की पीड़ा है, कुंठा है।&lt;br /&gt;वहां दायरा सीमित है, घनिष्ठ है&lt;br /&gt;यहां दायरा है भी तो इतना बड़ा&lt;br /&gt;कि पता नहीं&lt;br /&gt;आप कहां हैं। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8189282959156785963-8984166180295738511?l=sotadu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sotadu.blogspot.com/feeds/8984166180295738511/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8189282959156785963&amp;postID=8984166180295738511&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/8984166180295738511'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8189282959156785963/posts/default/8984166180295738511'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sotadu.blogspot.com/2008/08/blog-post_9651.html' title='वहां और यहां'/><author><name>सोतड़ू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17684686105765463995</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_R5uApMo8bsU/SKQjJnEgqAI/AAAAAAAAAEQ/hQaFd51XrkM/s1600-R/slept.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry></feed>
